Sunday, 30 October 2016

बिन दिये कैसी दीवाली?

एक जमाना था जब दीपावली में हर घर पे मिट्टी के दिये लगाये जाते थे, घर का आँगन हो या छत हर जगह पर दिये जलाके रखने में पूरा घर ही रोशन हो जाया करता था लेकिन अब वो दिये कहीं ग़ुम से हो चुके है. आधुनिक लाइट्स की चकाचोंग में उन दियो की रोनक अब कम लगने लगी है यही कारण है कि अब दीपावली की पहचान माने जाने वाले दिये अब खत्म की कगार पर पहुँच गये है.
         आज बाज़ारों में अलग अलग तरह की लड़ियाँ,चमकीले बल्ब और सजावट के तमाम समान आ चुके है ऐसे में लोगों के सामने बहुत से विकल्प है तो उनका ध्यान मिट्टी के दियो की तरफ़ जाता ही नहीं क्योंकि वक़्त के साथ साथ अब सजावट के तरीके भी बदल रहे है. लेकिन कभी सोचा है कि उन लोगों के लिए दीपावली कैसे रहेगी जो मिट्टी के दीये बेचकर अपनी दीपावली मनाते है? शायद हमारी वजय से उनकी दीपावली में रोनक नहीं होती, होगी भी कैसे क्योंकि हम उनकी मेहनत को नजरअंदाज करके महँगी और चमकदार लड़ियाँ को खरीद रहे है. हमे ये नहीं भूलना चाहिए की दीपावली का मतलब घर को रोशन करना नहीं बल्कि जरूरतमंद लोगों की जिंदगी में ख़ुशी देना है या यूँ कहे की किसी इंसान के घर पे आपकी वजय से ख़ुशी आये तो मतलब आपकी दीपावली सफल रही है. आज पूरा देश चीनी लड़ियों और पटाखों का बहिष्कार कर रहा है हर तरफ इन समानो पे रोक लगायी जा रही है लेकिन कोई ये नहीं बोल रहा है कि इस दीपावली में मिट्टी के दियो का प्रयोग ज्यादा से ज्यादा करे. यही तो हमारी कमी है कि हम हर बात को सिर्फ एक तरफ से सोचते है , मेरा मानना है कि इस दीपावली उन लाखों लोगों को खुश करते है जो मिट्टी के दिये बेचते है , हमारी ख़रीदारी से उनकी दीपावली बहुत अच्छी गुज़रेगी और उनके चेहरे पर जो ख़ुशी होगी वो आपको जिंदगी भर याद रहेगी और जब भी आप उन्हें याद करोगे खुद पर गर्व महसूस करने पर मजबूर हो जाओगे। मिट्टी से दीये को बनाना भी एक कला है इस कला की इज्जत करनी चाहिए, इस दीपावली हम चीनी समानों से तौबा कर रहे है, तो हमे एक कदम और उठाना चाहिए की लुप्त हो रही दिये की प्रथा को फिर से उठाया जाये।
        दीपावली खुशियों का त्यौहार है सिर्फ अपने घर की ख़ुशी या अपनों की ख़ुशी के लिए इसे मनाने से अच्छा है कि हम सब दूसरों के चहरे पर खुशी लेकर आए, इस दीपावली मिट्टी के दीये घर लायें।

Thursday, 27 October 2016

डर के साये में जिंदगी..

जरा सोचिए आप अपनी फैमिली के साथ आराम से घर पे सोये हुए है, तभी अचानक बम का एक गोला आपके छत पे गिरे और धड़ाम से फूट जाये तो उस वक़्त आप क्या करेंगे?क्या सोचेंगे?किस तरह परिवार को बचाएंगे? सोचने में ही डर लग रहा है तो जरा सोचिए कि उन लोगों की जिंदगी कैसी चल रही होगी जो रोजाना बॉर्डर पे इस तरह के डर में जी रहे है. हम सब अपने अपने घरों में आराम से खा-पी रहे है तो वहीँ दूसरी तरफ बॉर्डर पे रह रहे हजारों लोगों की जिंदगी पे लगातार मौत का खतरा बना हुआ है और वो खतरा है आतंकवाद.
 सर्जीकल स्ट्राइक के बाद से ही पाकिस्तान बौखलाया हुआ है जिसकी वजय से वो लगातार भारतीय सेना और बॉर्डर से सटे गाऊं को अपना निशाना बना रहा है. पाकिस्तान की हरकतों की वजय से घाटी में तनाव तो बना ही हुआ है उसके साथ साथ बॉर्डर में रह रहे लोगों को डर के साये में जीना पड़ रहा है. हिंदुस्तान की तरफ से हुयी सर्जीकल स्ट्राइक को पाकिस्तान पचा नहीं पा रहा है यही कारण है कि सर्जीकल स्ट्राइक के बाद से अभी तक 40 बार पाकिस्तान सैनिकों द्वारा सीज़फायर का उलंघन किया गया है. अब पाकिस्तान ने आतंकवाद फैलाने के लिए बॉर्डर पे रह रहे लोगों और स्कूली बच्चों को निशाना बना रहे है, पाकिस्तान की तरफ से अभी तक बम धमाकों में 3 महीनों में बॉर्डर के 19 स्कूल तबाह हो चुके है जिसके चलते हजारों बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ रहा है और अब वो बच्चे घर पर ही पढ़ने को मजबूर है. घाटी में जिस तरह तनाव चल रहा है उससे हर कोई परेशान है खासकर स्कूली बच्चे क्योंकि पाकिस्तान अब स्कूल के आसपास धमाके कर रहा है ताकि बच्चे डर जाये और स्कूल न जा सके. घाटी में आलम ये है कि आतंकवादी पुलिस वालों के हथियार छीन कर भाग रहे है मगर पुलिस बल कुछ नहीं कर पा रही है, आतंकवादियों को किसी का ख़ौफ़ नहीं है. एक तरह पूरा देश त्यौहारों में व्यस्त है तो वहीँ बॉर्डर पे बेस गाऊं में अभी भी सन्नाटा पसरा हुआ है, वहां पटाखों के बदले गोला-बारूद के फटने की आवाज़ें सुनाई दे रही है. रोजाना कई बार बॉर्डर पे पाकिस्तान द्वारा गोलियां बरसाई जाती है जिसमे बहुत से बेकसूर लोग घायल हो रहे है अब हमारी सरकार को भी उन तमाम लोगों के लिए कुछ ठोस कदम उठाने चाहिए वरना वहां लोग यूँ ही मरते रहेंगे और बाकि लोग पलायन का रास्ता अपनाएंगे .

Tuesday, 25 October 2016

फिर लौट आई चार धाम यात्रा...

उत्तराखंड में 2013 की वो आपदा कौन भूल सकता है, उसके जख्म आज भी लाखों लोगों के जहन पे मौजूद है. शायद ही किसी ने सोचा होगा की उस जख्म पर मरहम का काम 2016 की चार धाम यात्रा करेगी क्योंकि इस साल ये यात्रा पिछले कई सालों के मुकाबले बेहतर रही. इस साल चारो धामों यमनोत्री,गंगोत्री,केदारनाथ और बद्रीनाथ में श्रद्धालुयों की अच्छी-ख़ासी भीड़ देखने को मिली जिससे उत्तराखंड के पर्यटन पर भी अच्छा असर पड़ा और नतीजा ये रहा की जो पर्यटन लगभग पटरी से उतरता दिख रहा था एक बार फिर पटरी पर वापस लौट आया है.
                   17-18 जून, 2013 ये वो दिन है जो उत्तराखंड के लिए काला दिन साबित हुए, इन दो दिनों में बरसात के कारण उत्तराखंड के केदारघाटी में जो तबाही हुयी वो बेहद भयानक थी. जोरदार बारिश के कारण केदारघाटी में बादल फटा जिससे वहां मौजूद हजारों श्रद्धालुयों की जिंदगी छिन गयी. केदारघाटी में मुख्य मंदिर को छोड़कर सब कुछ तबाह हो गया, उसके बाद 2 साल तक इसका असर चार धाम यात्रा पर पड़ा. जिस यात्रा में हर साल लाखों श्रद्धालु आते थे,आपदा के डर से उनकी संख्ता बहुत नीचे पहुँच गयी, ऐसे में 2016 की यात्रा एक नई उम्मीद और आस्था का सैलाब लेकर आई . 2016 की चार धाम यात्रा में अभी तक 14 लाख से ज्यादा तीर्थयात्री दर्शन कर चुके है और ये आंकड़ा अभी भी बड़ रहा है। उत्तराखंड में पर्यटन की दृष्टि से ये बेहद अच्छी खबर है क्योंकि उत्तराखंड में चार धाम यात्रा का विशेष महत्व है. सरकार के बहुमूल्य प्रयास और स्थानीय लोगों के प्रचार-प्रसार की बदौलत एक बार फिर चार धाम यात्रा श्रद्धालुयों को अपनी और खीचने में कामयाब हुई और डूबते पर्यटन को एक बार फिर सहारा दिया। पहाड़ों पे लगातार हो रहे पलायन को रोकने के लिए भी ऐसी यात्रा की हमे सख्त जरुरत थी क्योंकि पहाड़ों पर रोजगार न होने के कारण, लोग पहाड़ छोड़ने पर मजबूर हो रहे थे, न दुकानदारी चल रही थी न ही कमाई का कोई साधन मिल रहा था ऐसे में चार धाम यात्रा की वजय से पहाड़ों तक एक बार फिर रोजगार पहुँचा, और दुकानदारों, व्यापारियों के चेहरों पर खुशी देखने को मिली। बरसात तक लाखों श्रद्धालुयों के चारो धामों के दर्शन किए और बरसात के बाद एक बार फिर यात्रियों के आने का सिलसिला जारी है, अब चार धाम यात्रा बंद होने में कुछ ही दिन बचे है लेकिन 2016 की इस यात्रा ने 2013 के जख्म पर मरहम का काम किया है, हम यूँ भी कह सकते है कि आपदा के बाद एक बार फिर चार धाम यात्रा लौट आई .

Saturday, 22 October 2016

फिर कुल्हाड़ी पर पैर मार रहा पाकिस्तान..

पाकिस्तान इस वक़्त दिमाग से कुछ काम नही कर रहा है,वो बस हर तरह से भारत को नुक्सान पहुँचना जानता है चाहे इसके लिए उसे अपने ही मुल्क के लोगों से लड़ना पड़े. अब उसने फिर एक ऐसा कदम उठा लिया है जिससे उसे ही नुक्सान झेलना पड़ सकता है, भारत से नाराज़गी इस क़दर है की पाकिस्तान सरकार ने अब पाकिस्तान में हर भारतीय चैनेल के प्रसारण पर रोक लगा दी है और अगर कोई ब्रॉडकास्टिंग कंपनी इसका उलंघन करती पाई जाती है तो उसके खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही की जायेगी। 
          इन दिनों भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव अपने चरम पर है, ऐसे मैं पाकिस्तान हर तरीका अपनाने की कोशिश कर रहा है जिससे भारत को कोई न कोई नुक्सान हो लेकिन ये कदम पाकिस्तान को ही भारी पड़ सकता है क्योंकि 20 करोड़ की जनसंख्या वाले पाकिस्तान मैं हर कोई हिन्दुस्तानी फिल्मों और सीरियल्स का दीवाना है. पाकिस्तान में अभी तक रोजाना सिर्फ 3 घंटे ही विदेसी कार्यक्रमों को दिए जाते थे लेकिन भारतीय फिल्मों ओर नाटकों की लोकप्रियता को देखते हुए पाकिस्तान में भारत के सीरियल्स का रिपीट टैलीकास्ट किया जाता है यानी की पाकिस्तान की आवाम को हिन्दुस्तानी सीरियल्स काफ़ी पसंद है तो अब पाकिस्तानी सरकार वहां की आवाम से कैसे समझोता करता है ये जल्द ही पता चल जायेगा.अब बात करे फिल्मों की तो बात हैरान करने वाली है कि पाकिस्तान मैं सबसे ज्यादा भारतीय फिल्में दिखाई जाती है ओर वहां इन्हें बहुत सराया जाता है। पाकिस्तान में मनोरंजन का 75 प्रतिशत कारोबार भारतीय फिल्मों की वजय से होता है बाकी 25 प्रतिशत पाकिस्तानी फिल्मों का होता है. आंकड़ों की तरफ देखे तो एक सिनेमाघर का मालिक अगर 100 रुपए कमाता है तो उसमें से 75 से 80 रुपए भारतीय फिल्मों की बिक्री की वजय से होता है। पाकिस्तान की अभी तक की सबसे कमाई वाली फिल्म ने पहले दिन मैं 1.6करोड़ का करोबार किया था, जबकि सलमान खान की सुल्तान ने पाकिस्तान मैं पहले दिन 3.4 करोड़ का करोबार किया, आंकड़े भी यही बयां कर रहे है की पाकिस्तान में भारतीय फिल्में ओर सरीअलस कितने लोकप्रिय है. पाकिस्तान से बहुत से कलाकार भारत मैं आकर बॉलीवुड मैं अपनी किस्मत आजमाते है, यहां जब उन्हें काम मिलता है वो तब पाकिस्तान में उन्हें जाना जाता है.
       पाकिस्तान की जनता भारतीय गानों की भी बहुत शौकीन है और वहां के बच्चों में "छोटा भीम" बहुत लोकप्रिय है, अगर पाकिस्तान भारत से इन चीजों को बंद करके बदला लेने जा रहा है तो पाकिस्तान को एक बार फिर सोचना चाहिए क्योंकि कहीं न कहीं वो अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार रहा है जिसमे नुकसान सिर्फ पाकिस्तान का ही होगा।

Wednesday, 19 October 2016

इस दिवाली "नो चीनी"

हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच वैसे ही तनाव चलता आया है,ऊपर से चीन का पाकिस्तान को समर्थन देना हिंदुस्तान की जनता को इस कदर चुबा की अब बात चाइनीज़ समान के बहिष्कार तक पहुँच चुकी है. इन दिनों भारत में त्योहारों का सीजन है ऐसे में चीन का बहुत सारा समान भारतीय बाज़ारों की रौनक बड़ाता आया है लेकिन इस बार देश में हर तरफ चीन के समान का बहिस्कार दिखाई दे रहा है और हो भी क्यों न क्योंकि आतंकवाद की फैक्ट्री माने जाने वाली पाकिस्तान को चीन का साथ मिल रहा है ऐसे में 125 करोड भारतियों का गुस्सा निकलना लाज़मी है.

भारत और चीन काफी समय से व्यापार करते आये है, इन दोनों देशों के बीच व्यापारिक दोस्ती काफी अच्छी है जिसका दोनों देशों को बहुत फायदा मिलता आया है। आंकड़ों की तरफ देखे तो हर साल भारत और चीन के बीच 70 अरब डॉलर का व्यापार होता है, बाकी देशों के मुकाबले चीन के साथ व्यापार करने में भारत को 6 गुना ज्यादा फायदा पहुँचता है. ऐसे में अब चीन के बने सामानों का बहिष्कार करना कहीं भारत की आर्थिकी पे बुरा असर न डाल दे. पाकिस्तान का साथ देने पर भारतियों पर काफ़ी आक्रोश देखा जा रहा है यही कारण है कि इस बार दिवाली जैसे त्यौहार पर हर तरफ चीन के समान की बिक्री पर रोक लगाने की मांग उठती जा रही है. दिवाली के समय पर भारतीय बाजारों में चीन की लड़ियाँ, लाइट्स, सजावट के समान और पटाखों का ज्यादा बोलबाला रहता है क्योंकि चीन के इन समानों की क़ीमत थोड़ी सस्ती होती है ऐसे में ये समान यहाँ बहुत चलते है और इनकी काफी मांग रहती है लेकिन इस बार दिवाली में चीन की लड़ियाँ और पटाखों पर प्रतिबंद लगाया गया है अब देखने लायक होगा की भारतीय बाजार पर इस कदम का कितना असर होता है. हमारे देश में चीन का व्यापार बहुत बड़ा है, पिछले 10 सालों में यहाँ चीन की बहुत सी मोबाइल कंपनियां,टेलिकॉम इंडस्ट्रीज़ और मेडिकल कंपनियां अपने पैर जमा चुकी है. 70 अरब डॉलर हर साल।
इसके अलावा स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स और रियल इस्टेट में भी चीन भारत पे करोड़ों निवेश करता है. इन दिनों चाइनीज मोबाइल कंपनियों ने हिंदुस्तान पर काफी मुनाफ़ा कमाया है, आज हिंदुस्तान में चीन की 25 मोबाइल कंपनियां है जो की भारतीय बाजार में काफी अच्छा कमा रही है. इके बात तो साफ़ है कि हिंदुस्तान और चीन के बीच में जो व्यापारिक दोस्ती है इसका फायदा दोनों देशों को है, और अगर हिंदुस्तान में लोग चीन की लड़ियाँ, लाइट्स और पटाखों पर रोक भी लगाते है तो इससे चीन के उच्च व्यापार पे कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि पटाखों और लाइट्स के अलावा भी भारत में चीन की मेडिकल,टेलिकॉम और इलेक्ट्रॉनिक इंडस्ट्री का बहुत बड़ा काम है.
       हमारी तरफ से ज्यादा न सही लेकिन एक कदम तो उठाया गया है जिससे शायद चीन को इस बात का ऐहसास हो जाये की पाकिस्तान का समर्थन करना उनके लिए कोई फायदा का सौदा नहीं है. लेकिन सच्चई ये भी है कि इससे भारत को भी कोई ज्यादा फायदा नहीं होगा .

Monday, 17 October 2016

आजकल सबकुछ ऑनलाइन..

पिछले 5-6 सालों में ख़रीदारी करने का स्वरूप बिलकुल ही बदल गया है, कभी बाज़ार में जाकर दिन भर 15-20 दुकानों में अच्छे से जांच परखकर समान लेते हुए लोग दिखते थे लेकिन आज सबकुछ ऑनलाइन हो चूका है। ऑनलाइन शॉपिंग का मतलब है घर बैठे इंटरनेट के जरिए समान को ऑर्डर करना। 
          ऑनलाइन शॉपिंग का प्रचलन सन 1990 से शुरू हुआ तब ये इतना ज़्यादा फायेदेमंद साबित नहीं हो पाया था लेकिन इंटरनेट की जबरदस्त मांग और बढ़ोतरी के चलते 2000 तक ऑनलाइन शॉपिंग का ग्राफ़ ऊपर बढ़ता गया और आज ऑनलाइन शॉपिंग से हर कोई जुड़ा है। आज बहुत सी ऑनलाइन शॉपिंग कंपनी, जैसे स्नैपडील, फ्लिपकार्ट, ईबे लोगों के लिए आ चुकी है जो हर वक़्त उपभोगतायों को आकर्षित करती है। ख़ासकर आजकल क्योंकि इनदिनों त्योहारों का समय में ऐसे में ऑनलाइन कंपनियां लगातार आकर्षक डिस्काउंट के साथ समान बेच रही है और ग्राहक भी इनको काफी हद तक पसन्द करते है। इन दिनों दिवाली सेल का बोलबाला है, दिवाली भारत की सबसे ख़ास त्याहारों में से एक है ऐसे में लोग भी इस त्यौहार को यादगार बनाने के लिए बहुत सी शॉपिंग किया करते है चाहे कपड़े लेने हो या घर का कोई समान इससे अच्छा मौका लोगों के पास नहीं होता यही कारण है कि हर ऑनलाइन शॉपिंग कंपनी अपने ग्राहकों के लिए दिवाली ऑफर्स लेकर आती है जिनके अंतर्गत ग्राहकों को अच्छे कीमत वाले समान पर अच्छा डिस्काउंट मिलता है। खासकर इलेक्ट्रॉनिक चीजों जैसे टेलीविज़न, मोबाइल फ़ोन और फ़्रिज जैसे उपकरणों पर ज्यादा डिस्काउंट होता है, हर साल त्योहारों के समय पर ऑनलाइन कंपिनियों को करोड़ों का फ़ायदा होता है। एक तरफ ऑनलाइन सर्विस शुरू होने से ग्राहकों को फायदा पहुँच रहा है तो वहीँ दूसरी तरह दुकानदारों को इससे घाटे का सौदा करना पड़ रहा है क्योंकि ग्राहकों को तो ऑनलाइन कॉम्पिनियां पहले ही आकर्षित डिस्काउंट देदेती है तो दुकानदारों से कौन भला समान खरीदेगा? ययही कारण है कि ऑफलाइन शॉप हमेसा ऑनलाइन कंपिनियों के खिलाफ रहते है। ऑनलाइन शॉपिंग का ट्रेंड आज सर चड़कर बोल रहा है ऐसे में लोगों को कुछ बातों का हमेसा ध्यान रखना चाहिए की जिस ऑनलाइन कंपनी से वो हजारों का समान खरीद रहे है वो सुरक्षित हो, उसमे कोई धोखाधड़ी या गोलमाल न हो क्योंकि बहुत बार देखा गया है की ऑनलाइन शॉपिंग के चकजर में लोगों को ठगी का शिकार होना पड़ा है।
           आजकल ऑनलाइन शॉपिंग ने हमारे खरीदने की सोच को बड़ा दिया है, एक जगह पर ही अब हजारों ब्रांड के समान उपलब्ध होने से हम इनकी तरफ आँख बंद करने भरोसा करने लगे है। ऑनलाइन शॉपिंग करते हुए हमेसा सुरक्षा बरते वरना परिणाम बहुत शर्मनाक हो सकता है।

Saturday, 15 October 2016

तीन प्रथायों को खत्म करने की आवाज़

आखिरकार मुस्लिम महिलायों ने अपनी आवाज़ को उठाते हुए कुछ प्रथायों को खत्म करने की मांग की है। सरकार पर दवाब तो बनाया जा रहा है लेकिन अंत में फैसला क्या होगा ये तो आने वाला समय ही बताएगा।

         बात चाहे तीन तलाक़ की जो या बहुविवाह की अब मुस्लिम महिलाएं चाहती है कि इन सब रीति रिवाजों को खत्म किया जाये क्योंकि ये उनके मान के खिलाफ है। बात करे तीन तलाक़ की तो ये प्रथा मुस्लिम धर्म और समाज में पिछले कई सालों से चलती आ रही है जिसके अंतर्गत मात्र तीन बार मौखिक तरीके से तलाक तलाक तलाक बोल देने से पति-पत्नी का रिश्ता खत्म हो जाता है, जानकार हैरानी होगी की मुस्लिम समुदाय की 93 प्रतिशत महिलाएं इसे प्रथा को खत्म करना चाहती है। बात भी बिलकुल सही है कि सिर्फ मौखिक तौर पे तलाक बोल देने से रिश्ता खत्म करना सही बात नहीं। दूसरा मुद्दा है मुस्लिम आदमी द्वारा बहुविवाह की परंपरा। इसके अंतर्गत मुस्लिम समाज में और कानून के अनुसार मुस्लिम युवक दो से ज्यादा विवाह कर सकता है उसे कानून इसकी इजाज़त देता है। मुस्लिम महिलायों को इससे सख्त नाराजगी है और वे सब इस प्रथा को खत्म करने की मांग कर रहे है। इसके अलावा तीसरा मुद्दा है हलाला,जिसमे अगर एक तालकसुदा महिला अपने पति के साथ फिर रहना चाहती है तो उसे इसके लिए पहले एक अन्य आदमी से निकाह करना पड़ेगा। इस तरह की तमाम प्रथाएं मुस्लिम समुदाय में चलती आ रही है और अब मुस्लिम महिलाएं इसका जबरदस्त विरोध कर रही है। अभी तक मुस्लिम समुदाय में महिलायों की शादी 18 साल से पहले ही करवा दी जाती है जबकि 95 प्रतिशत महिलाएं चाहती है कि उनकी शादी 18 साल के बाद करायी जाये, इसके अलावा मुस्लिम समुदाय में जो कपड़ों को लेकर विवाद रहता है अब उसे भी खत्म करने की मांग की जा रही है। मुस्लिम महिलायों की माने तो उन्हें उनके पसंद के कपड़े पहनने की इजाजत दी जाये जरुरी नहीं की सिर्फ बुर्खे में जिंदगी गुज़ार ली जाये।
          आज मुस्लिम लॉ बोर्ड के सामने बहुत से सवाल खड़े हो चुके है, लाखों मुस्लिम महिलाएं अब जिंदगी के तरीके बदलना चाहती है अभी तक उन्हें हर छेत्र में दबाया जाता रहा है तो अब उनकी आवाज ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया है। बात चाहे तीन तलाक की हो या बहुविवाह की अब मुस्लिम महिलाएं इन प्रथायों को खत्म करके की दम लेंगी।