Wednesday, 28 September 2016

नाच न जाने आँगन टेड़ा..

किसीने सच ही कहा है कि आधा ज्ञान हानिकारक होता है, अगर किसी चीज़ के बारे में पता ही न हो तो उस तरफ चलना ही क्यों? ये तो वही बात हो गयी कि,नाच न जाने आँगन टेड़ा"। हम अक्सर देखते है कि कुछ लोग बिना सोचे समझे ऐसे कदम उठा लेते है जिनके बारे में उन्हें कुछ पता ही नहीं होता, वो ऐसा क्यों कर रहे है?किस लिए कर रहे है और क्या मिलेगा ऐसा करके?
         हम ऐसा इसलिए बोल रहे है कि आज कश्मीर में जो युवा सेना के जवानों पर पत्थर फ़ेंक रहे है उन युवायों को खुद ही नहीं पता की वो ऐसा क्यों कर रहे है। उनकी समझ इतनी नहीं है कि वो इस बात को समझ सके की क्या सही है क्या गलत। जब मीडियाकर्मी ने कश्मीर जाकर इन पत्थरबाजों से बातचीत करी, तो पत्थरबाजों के जवाब सुनके सब चोंक गए। जब पत्थरबाजों से पूछा गया कि वो भारतीय सेना पर पत्थर क्यों फेंक रहे है तो उन युवायों का कहना था कि उन्हें ये नहीं पता की वो पत्थर क्यों फेक रहे है न ही उन्हें ये पता है कि वो किस बात की आज़ादी मांग रहे है। ये बेहद शर्मिंदगी वाली बात है कि जिस देश में हम रह रहे है, जिस धरती पर जन्म लिया जिस देश का खाना हम खाते है उसी देश के खिलाफ आज युवा ज़हर उगल रहा है। कश्मीर में हिंसा को भड़काने वाले आतंकवादी घाटी के युवायों को निशाना बनाके बीएसएफ के जवानों पर हमला कर रहे है। उन्हें ये बात अच्छे से पता है कि घाटी में युवायों को किस तरह से भटका सकते है, कुछ रुपए का लालच देकर वो उनके हाथों पे पत्थर रख रहे है वो बहुत से नासमझ युवा सही गलत को न देखते हुए वो काम कर रहे है जो की देश के खिलाफ है। चौकाने वाली बात ये है कि इन युवायों को उम्र 15 से 22 साल तक की है, कुछ तो अभी स्कूल जाते है। उउन्हें आजादी चाहिए लेकिन किस बात की आजादी ये किसी को नहीं पता, भारत को आजाद हुए तो 70 साल हो गए है , अब कौन की आजादी चाहिए इन्हें? जिन्हें आजादी का मतलब ही नहीं पता उन्हें आजादी आजादी चिल्लाने का भी हक़ नहीं होता, बेवजय चिल्लाना और देश के खिलाफ आवाज उठाना बेहद गलत है।
         मुझे ये बात समझ नहीं आती की कोई पढा-लिखा हुआ इस तरह की बचकानी हरक़तें कैसे कर सकता है, सिर्फ एक दूसरे को देखकर या किसी की दही बातों पे आकर अपने ही देश के खिलाफ होना उनके लिए बड़े शर्म की बात है। कश्मीर कल भी हिंदुस्तान का था, आज भी है और कल भी हिंदुस्तान का ही रहेगा ये बात पूरी दुनिया को पता होना चाहिए खासकर पाकिस्तान को।

Tuesday, 27 September 2016

बिना समझौता तोड़े भारत लेगा बदला..

उड़ी हमले की आज पूरा हिंदुस्तान निंदा कर रहा है, आवाम की मांग है कि जल्द से जल्द पाकिस्तान को उनकी इस हरकत की कठौर सज़ा दी जाये। अब युद्ध के लिए तो शायद हमारी सरकार इजाजत न दे तो एक और तरीका भारत ने ख़ोज निकाला है जिससे बिना युद्ध किये पाकिस्तान को उड़ी हमले की सज़ा मिल जायेगी। वो सज़ा मिलेगी सिंधु जल समझौते को तोड़कर, लेकिन क्या इस समझौते को तोड़ना भारत के लिए इतना आसान होगा? 
            कराची में 19 सितम्बर,1960 को भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी जल समझौता हुआ था, तब तीन पार्टियों भारत, पाकिस्तान और वर्ल्ड बैंक ने इस पर हस्ताक्षर किये थे। इस समझौते के अंतर्गत भारत से सिंधु नदी के साथ साथ उसकी सहायक नदियों के पानी को पाकिस्तान के लिए देना था, इससे पाकिस्तान को पानी तो मिलता ही इसके साथ साथ दोनों देशों के बीच दोस्ती भी रहती लेकिन समझौते के 5 साल बाद ही पाकिस्तान की तरफ से हिंदुस्तान पर आतंकी हमला हुआ और तभी से भारत समझ गया कि पाकिस्तान हमारा ही पानी पीके हमसे ही युद्ध करेगा। लेकिन बावजूद इसके भारत ने पिछले 55 सालों से कभी भी इस समझौते को तोड़ने की बात नहीं कही, जबकि पाकिस्तान की तरफ से हमेसा युद्ध होता रहा है। 1971 का युद्ध , फिर कारगिल और उसके बाद भी कई बार पाकिस्तान ने भारत को इस समझौते को तोड़ने के लिए मजबूर किया लेकिन भारत ने बड़प्पन दिखाते हुए ये कदम नहीं उठाया। आज हर टीवी चैनल, अखबार और विशेषज्ञ ये बात बोल रजे है कि भारत को सिंधु जल नदी समझिता तोड़ देना चाहिए ताकि पाकिस्तान पानी के लिए तड़प उठे। लेकिन क्या हम ये जानते है कि इस समझौते को तोड़ना कोई आसान काम नहीं है। अगर भारत इस समझौते को तोड़ता है फिर भी वो सिंधु और उसकी सहायक नदियों का पानी पाकिस्तान जाने से नहीं रोक सकते क्योंकि अभी तक भारत ने इसके लिए कश्मीर में कोई डैम या नहर नहीं बनाई है। अगर समझौता आज टूटता भी है तो पानी रोकने में 15 से 20 साल तक लगेंगे। दूसरा कारण ये है कि अगर भारत ये समझौता तोड़ देता है तो पाकिस्तान में आतंकवादी आवाम को हिंदुस्तान के खिलाफ खड़ा कर सकते है। इसलिए भारत ये समझौता तो नहीं तोड़ेगा लेकिन अपने अधिकारों का अब पूरा यूज़ करेगा। अभी तक हिंदुस्तान सिंधु और उसकी सहायक नदियों यानि की  झेलम,रवि,सतलुज और चेनाब का भरपूर यूज़ नहीं किया है, भारत सिर्फ 20 % पानी का इस्तेमाल करता है जबकि समझौते के हिसाब से भारत 60 प्रतिशत पानी का इस्तेमाल कर सकता है। अगर भारत सिंधु जल समझौता का भरपूर इस्तेमाल करता है तो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो जायेगी।
        पाकिस्तान को अब ये नहीं भूलना चाहिए की भले की भारत इस समझौते को बड़ी तोड़ सकता लेकिन वो अपने सिंधु जल समझौते का पूरा इस्तमाल कर सकता है जो की पाकिस्तान के लिए बड़ी चिंता का विषय है। पाकिस्तान की 77 प्रतिशत जनता सिंधु और उसकी सहायक नाफ़ियों के भरोसे है ऐसे में अगर भारत भी इस समझौते से नदी का ज्यादा इस्तेमाल करता है तो पाकिस्तान की हालत क्या होगी ये पूरा पाकिस्तान जनता है।

Monday, 26 September 2016

4जी डाटा नहीं आटा चाहिए..

रोटी, कपडा और मकान इन तीन चीजों के बिना जीवन गुजारना किसी चुनोती से कम नहीं , और आज इन्हीं तीन को खरीद पाना हर किसी के बस में नहीं क्योंकि लगातार महँगाई आसमान छू रही है। गरीबों की सुध लेने वाला कोई नहीं दिखता, क्योंकि पूरी दुनिया तो अपने अपने काम और पैसों के लिए भाग रही है। 
              रिलायंस के मुखिया मुकेश अंबानी ने इतनी महँगाई के बावजूद तीन महीने के लिए देश भर में 4जी डाटा देने का कारनामा तो कर दिखाया लेकिन इससे किसी भी एक गरीब का भला होगा? क्या वो लोग 4जी डाटा इस्तमाल कर सकेंगे जो दो वक्त की रोटी के मोहताज़ है? बिलकुल भी नहीं क्योंकि गरीबों के लिए क्या 3जी क्या 4जी, उनकी नजर से देखा जाये तो रिलायंस ने सिर्फ अमीरों का भला किया है। निचले वर्ग या गरीब लोगों के लिए ये कोई अच्छा कदम नहीं है , अंबानी साहेब उन्हें डाटा नहीं आटा चाहिए। हमारे देश में हजारों ऐसे लोग है जिनकी कमाई करोड़ों रुपए से भी हजार गुना ज्यादा है , दुनिया के सबसे धनी लोगों में हिंदुस्तान के भी कई चेहरे देखने को मिलते है लेकन यही हिंदुस्तान करोड़ों उन लोगों का भी ही जो बड़ी ही मुश्किल से अपनी जिंदगी को जी रहे है,ना खाने के लिए खाना है, न रहने के लिए घर न ही पढ़ाई के लिए रुपए। ऐसे में वो लोग 4जी डाटा का क्या इस्तमाल करेंगे क्योंकि मोबाइल फ़ोन भी तो नहीं है। काश रिलायंस ग्रुप तीन महीने के लिए गरीब लोगों के लिए कुछ किलो आटा मुफ्त कर देता तो करोड़ों गरीब लोग उन्हें दुवाएं देते। आज भारत में लगभग 10 करोड बच्चे ऐसे है जो स्कूल नही जाते क्योंकि उनके माँ-बाप के पास उन्हें पढ़ाने के लिए रुपए तक नहीं है तो गरीबी से लड़ने के लिए वो बच्चे मजदूरी करते है। ऐसे ही 3 करोड बच्चे वो है जो कुछ घण्टे स्कूल जाते है फिर काम पर निकल जाते है, ये सब उनकी मजबूरियां है क्योंकि उन्हें रोटी चाहिए जो की सिर्फ मजदूरी करके ही तो मिलेगी, ऐसे में अगर 4जी डाटा की जगह 1-1 किलो आटा ही मिल जाता तो उन करोड़ों बच्चों के चेहरों पर जो खुसी होती वो हम कभी बयां नहीं कर सकते। मैं ये नहीं बोल रहा हूं कि गरीबों की तरफ कोई देखता ही नहीं है लेकिन इन्हें वो सब सुविधाएं नहीं मिल पा रही है जो इनकी जिंदगी को  कुछ हद तक आसान कर सके। सरकारी और प्राइवेट संस्थाएं अगर कुछ करोड रुपए को ईमानदारी से गरीबों की जिंदगी में लगाये तो कुछ ही सालों में हिंदुस्तान से गरीब शब्द ओझल हो जायेगा।
        आज पूरा हिंदुस्तान रिलायंस जियो से प्रभावित है और हो भी क्यों न, इतनी महँगाई में जहाँ हर चीज़ के दाम ऊपर बड़ रहे है ऐसे में तीन महीने तक फ्री 4जी किसी सपने से कम नहीं है। मगर ये भी हमे पता है कि 4जी का लुफ्त गरीब लोग कैसे उठा पाएंगे? काश रिलायंस तीन महीने तक हर गरीब परिवार को 4जी डाटा की जगह आटा देते। 

Sunday, 25 September 2016

बस्ता है या बोझ..

सुबह सुबह स्कूल के लिए बच्चों को जाता देख एक ही सवाल मन में आता है कि ये इनका बस्ता है या कोई बोझ क्योंकि छोटे छोटे बच्चों की पीठ पर लटके बड़े-बड़े बैग किसी भरी बोझ से कम नही लगते। सरकार का नियम है कि स्कूली बच्चों के बैग का वजन भारी नहीं होना चाहिए लेकिन अक्सर देखने को मिलता है कि बच्चों के बैग का वजन उन्हें वजन से भी ज्यादा भारी होता है। 
  ऐसा नहीं है कि आजकल ही ऐसा देखने को मिलता है, जब मैं भी स्कूल जाया करता था तब मेरा बस्ता भी किसी बोझ से कम नहीं हुआ करता था, घर से स्कूल तक यही सोचता था कि आखिर इतना ज्यादा भार क्यों? कोई हमे देखता क्यों नहीं ही की हम क्या झेल रहे है और कैसे झेल रहे है। घर से निकलते ही लंबे रास्ते को सोचता था और फिर अपने 10 किलो के बस्ते को एक मज़दूर की तरह अपने कंधों पर रखकर स्कूल की तरह निकल पड़ता था। हँसी भी आती थी की पढ़ाई-लिखाई इतनी होती भी नहीं है जितनी किताबें बस्ते के अंदर राखी रहती थी। मुझे ऐसा लगता है कि बच्चों पर इतना बोझ रखने की कोई जरूरत नहीं है अगर घर के लिये होमवर्क भी दे रहे है तो 2 या 3 विषय बहुत है क्योंकि ज्यादा विषयों पर एक साथ काम देना बच्चों के समझ में नहीं आता है सिर्फ बस्ते का वज़न जरूर बढ़ाता है। कानून भो कहता है कि स्कूली बैग का वजन भारी नहीं होना चाहिए और अगर किसी स्कूल को इसका दोषी पाया जाता है तो स्कूल प्रशाशन के खिलाफ सख्ती से कार्यवाही की जएगी, उस स्कूल के प्रिंसिपल और प्रबंदकों को भी सज़ा में हिस्सेदारी मिल सकती है। तो सरकार ने बच्चों के इस समस्या के लिए कड़े कानून तो बना दिए है लेकिन सच्चाई हम सबके सामने है। आज भी रोजाना करोड़ों स्कूली बच्चे पढ़ाई का बोझ एक बस्ते में रूप में लेकर स्कूल जाते है, जिसमे स्कूल प्रशाशन चुप्पी साधे बैठा रहता है। 
            वैसे ही हमारे देश में शिक्षा की बदहाली रहती है, कहीं बच्चे नहीं है तो कहीं शिक्षक नहीं है तो कहीं ये दोनों है तो पढ़ाई के लिए स्कूल नहीं है। एजुकेशन सिस्टम का हाल तो सबसे ज्यादा बुरा है ऐसे में अगर सरकार इन छोटी छोटी बातों पर भी सख्ती नहीं दिखाएगी तो छोटे-छोटे मासूम बच्चों का क्या होगा?कब तक तो हर सुबह अपने वज़न से भी ज्यादा भारी बस्तों को लेकर स्कूल जायेंगे? माना कि उन कंधों ने कल देश का भार संभालना है इसका ये मतलब तो नहीं की अभी से उनको 10-10 किलो ने बस्ते पकड़ा दिए जाये।

Saturday, 24 September 2016

अब न कहना भी मुश्किल..

एक मेडिकल कॉलेज की लड़की को कॉलज जाते हुए एसिड अटैक का शिकार बना दिया जाता है, एक काम करने वाली लड़की को सरेआम 25 बार चकुयों से मारा जाता है, एक लड़की को जला दिया जाता है ये सब घटनाएं रोजाना हमारे देश में होती है क्योंकि लड़कियों का कसूर सिर्फ इतना है कि उन्होंने मनचले आशिक़ का प्रेम प्रस्ताव को मना किया। 
            बड़े ताज्जुब की बात है कि जिस देश में लड़कियां आईपीएस,पीसीएस और यहाँ तक की राष्ट्रपति तक बन जाती है उसी देश में आज भी लड़कियों को राह चलते मार दिया जाता है। कुछ सरफिरे लड़के जो खुद को आशिक़ नाम देते है उन्हें ये कौन समझाये की इस तरह की हरकतें इंसान नहीं बल्कि शैतान करते है। उन्ही वजय से आज लड़कियों को न कहने का डर सताने लगा है क्योंकि न कहने पर तो लड़कियों की जिंदगी बर्बाद करदी जाती है या उन्हें मार दिया जाता है। ये तो उस ज़माने की तरह हो गया जब राजा अपने राज्य में कोई सुंदर लड़की को देख लेते थे या उन्हें अगर को पसंद आ गयी तो वो उस राजा को हर कीमत पर चाहिए, चाहे उसके लिए खून तक बेह जाये। अरे ये 21वीं सदी है, आज इंसान चाँद को छू रहा है और कुछ सरफिरे युवक आज भी लड़कियों को दासी समझ रहे है। आज लड़कियों को इतना भी हक़ नहीं की वो किसी लड़के के प्रेम प्रस्ताव को न बोल सके, उनकी जिंदगी है उन्हें फैसला लेने दो जबरदस्ती न रिश्ता बनता है और न ही बनाया जाता है। कुछ दिनों तक लड़की का पीछा करना, उसे डराना-धमकाना , गलत हरकत करना ये सब वो करते है जो लड़के नहीं होते या यूं कहें जो मर्द ही नहीं होते, सबसे पहले इंसानियत को सीख लो तब सोचना इधर-उधर की। आजकल लड़कों ने लड़कियों को परेशान करना अपना पेशा बना दिया है, अगर लड़की ने गुस्सा किया या लड़के का दिल तोड़ा तो उस लड़की को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती, झूट-झूट की कहानियां, गंदे आरोप और चरित्र पे सवाल खड़े कर दिए जाते है। अक्सर ये देखा जाता है कि को युवक खुद बदनाम है वो भी अगर किसी लड़की के चरित्र पे ऊँगली उठाये तो उसी को सब मान लेते है क्योंकि लड़कियों को तो उनकी सच्चाई के साथ दबा दिया जाता है। सबसे ज्यादा बुरा हाल आज दिल्ही का है जहाँ रोज़ाना सरफिरे आशिक़ न कहने वाली लड़कियों को बेहरमी से मार देते है या उनपे एसिड फेंक देते है न प्रशाशन का डर न ही खुदा का।
           इस तरह की घटनाओं को जल्द की रोकना होगा लेकिन कैसे? मेरा मानना है कि इस तरह के आरोपियों को हिरासत में लेने की कोई जरूरत नहीं है उन्हें सीधा जान से मार देना चाहिए उन्हें जेल में बंद करने से कुछ भला नहीं होगा देश का सिर्फ कैदियों की संख्या में इजाफ़ा होगा। उन्हें ये बताने की जरूरत है कि लड़कियां उनकी जागीर नहीं की उनका फ़ैसला हसते-हसते मान लिया जाये।


Friday, 23 September 2016

मिट्टी की खुशबू सी यादें..

जब बारिश की पहली बूँद मिट्टी पर गिरती है उस वक़्त जो मिट्टी की खुशबू आती है वो हर किसीके दिल को छू जाती है उसी तरह हमारी जिंदगी में कुछ यादें उसी खुशबु की तरह होती है जिन्हें सोचकर ही दिल खुश् हो जाता है। चाहे यादें अच्छी हो या बुरी लेकिन वो पुरानी बात और पुराने पल तरोताज़ा कर जाती है,इसलिए यादों को मैं मिट्टी की खुशबू के समान मानता हूं।
        आज हम अपने बचपन को पीछे छोड़ आगे निकल चुके है, जब 9-10 साल के थे तब जिंदगी बहुत अलग थी, आज अलग है और आने वाले समय में भी अलग होगी क्योंकि सब चीज वक़्त के साथ बदलती रहती है। बचपन में स्कूल जाने का बिलकुल मन नहीं होता था, माँ मार मार के घसीटते हुए स्कूल गेट तक लेकर जाती थी, उस वक़्त मेरा कहीं भाग जाने का मन होता था लेकिन जब दिन में छुट्टी की घंटी कानो पर पड़ती थी वो सुबह का गुस्सा न जाने कहाँ भाग जाया करता था। घर पहुँचते ही कहीं जुटे तो कहीं कपड़े फेंककर मस्ती में लग जाय करता था। ये बचपन की बातें आज भी अच्छे से याद है जब हाजी सोचता हूं तो आँखों के सामने बचपन की तस्वीर आ जाती है। जितनी खुशी मुझे ये सब सोचकर मिलती है उतनी ही तकलीफ मुझे इस बात से होती है कि अब बचपन कभी मुड़ के वापस नहीं आएगा, बचपन के दिन चले गए अब जिंदगी के असली मायनों को देखने और सीखने का समय आ गया है। लयकीन आज भी जब खिड़की से बारिश को जमीं पे गिरता देखता हूं तो बचपन की यादें ताज़ा हो उठती है, तब भी में बारिश के बूदों को गिनने की कोशिश करता था, हर बार करता था लेकिन हमेसा हार जाता था। हँसी सी आती है ये सब सोचकर तो थोड़ा हस लिया करता हूँ क्योंकि आज भी में उन बूदों को गिनने में कामयाब नहीं हो पाता। मुझे आज भी याद है सर्दियों में सुबह के वक़्त सीसे पे धुंध पड़ी रहती थी, उनमें ऊँगली से घर बनाना, घर के बहार एक गाड़ी और एक गेट, मानो मैं अपना सपना उसमे बना रहा हूँ।
         आज ये सब बातें एक याद बनकर रह गयी है लेकिन आज भी ये उस वक़्त जिंदा हो उठती है जब मिट्टी की खुशबू आती है। अपनेपन का एहसास तो कराती ही है उसके साथ साथ कुछ पलों के लिए हमे बचपन की तरफ लेकर चली जाती है ये खुसबू।

Thursday, 22 September 2016

हमारी अधूरी कहानी..

इश्क़, प्यार और महोब्बत तीन अलग अलग शब्द है लेकिन इनका मतलब एक ही है। आज भले ही प्यार का मतलब किसी को पता न हो लेकिन हर कोई इसमें गिरना चाहता है, इसके रंग देखना चाहता है इसे महसूस करना चाहता है। प्यार सिर्फ लड़का-लड़की वाला नहीं होता, एक माँ का अपने बच्चे के लिए, एक बहन का अपने भाई के लिए भी होता है। लेकिन आज के भागदौड़ भरी जिंदगी में किस के पास इतना समय है कि वो प्यार का मतलब जाने। बस बेहिसाब दौलत मिल जाये प्यार तो कहीं से भी मिल जायेगा। 
            प्यार हर रिश्ते को मजबूती देता है, एक पकवान में स्वाद का काम करता है प्यार। जब माँ अपने बच्चे के माथे को चूमती है तब एहसास होता है कि आखिर क्या है प्यार। जब बहन अपने छोटे भाई को गोद में इधर-उधर घुमाती है तब मालूम होता है कि ये है प्यार। सिर्फ प्यार बोलने से नहीं मिलता न ही बढ़ता है, इसके लिए चाहिए समझ और एहसास। हीर-रांझा, सोनी-महिवाल को कौन नहीं जानता इनके प्यार के रिश्तों के बारे में हम हमेसा सुनते आये है। ये आज भले ही हमारे बीच में नहीं है लेकिन जब भी प्यार की बात आती है तो इनका नाम आना लाज़मी है क्योंकि इनका प्यार सच्चा था,अटूट था। आज ये नहीं है लेकिन प्यार का एहसास कभी नहीं जाता, वो तो हवा की तरह हमेसा यही रहता है। लेकिन सब रिश्तों की हैप्पी एंडिंग हो ये मुमकिन तो नहीं, हर रिश्ता प्यार पे शुरू हो और प्यार पे ही खत्म ये भी मुमकिन नहीं क्योंकि बहुत बार प्यार तो होता है लेकिन मिल नहीं पता। सबके प्यार की कहानी पूरी नहीं हो पाती, जिनकी होती है वो सच में भाग्यशाली होते होंगे और जिनका प्यार अधूरा रह जाता है उनकी कहानी भी अधूरी रह जाती है। पास तो आते है लेकिन दूरियाँ कम नहीं होती क्योंकि जरुरी नहीं की आसमा और जमीं कभी एक हो, उसी तरह ये भी जरूरी नहीं की हर प्यार पूरा हो।और जब प्यार पूरा नहीं होता, जिसे हम चाहते है उसका साथ उम्रभर नहीं मिलता तो वो वक़्त वो पल हमे तड़पा तड़पा के मार देता है। अगर प्यार अधूरा रह जाये तो जिंदगी तो रहती है पर जीने का मन नहीं करता, न खुद की खबर रहती है ना किसीकि सुध बस उसका चेहरा बार बार याद आता है। दिन तो जैसे तैसे गुज़र जाता है लेकिन शाम फिर उसकी याद लेकर दरवाजे में दस्तक देती है, फिर वो रात 7-8 घंटो की नहीं बल्कि 7-8 सालों की लगती है। आज इंसान सिर्फ पैसों के लिए पागल हो रहा है ना घरवालों की चिंता रहती है ना अपने चाहने वालों की, लेकिन जब कोई चाहने वाला दूर चला जाता है तब हम उस वक़्त को याद करते है जब हम उन्हें वक़्त नहीं दे पा रहे थे। कोसते है तब खुद को की ये क्या हो गया, चाहता था जिसे दिलो जान से आज वो ही दूर चला गया।
       प्यार हर किसी को मिले ये जरूरी नहीं , प्यार अगर गुड़ की तरह मीठा होता है तो इसी को आग का दरिया भी कहा जाता है। ये हमेसा दो रूप दिखता है, कभी हसाता है तो कभी रुलाता है। अगर कोई तम्हे दिल से प्यार करे तो उसका साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि इस दुनिया में सबसे खूबसूरत एहसास है प्यार, बहुत किस्मतवालों को मिलता है।