Wednesday, 31 August 2016

लहू मुँह लग गया..

आजकल हमे रोजाना ही बाघ के हमलों की खबरें सुनने को मिल रही है, कभी मवेशियों को अपना शिकार बना रहा है तो कभी इंसानों को लेकिन वैन विभाग और हमारा प्रशाशन बाघों के बढ़ते आतंक को रोकने में कामयाब नहीं हो पा रहा है। कहते है की एक बार बाघ में मुँहइ खून लग जाये तो वो बार बार उसकी तलाश में घटकता है और हर बार बकरी,गाय और इंसानों को अपना निवाला बनाता है। 
कुछ साल पहले तक बाघों के हमले सिर्फ पहाड़ों पर बसे गाऊं और छोटे कज्बों तक ही देखने को मिलते थे लेकिन आज ये शहरों तक पहुँच चुके है। इसका सबसे बड़ा करण है लगातार बड़ रहा जंगलों का कटाव, जिसके चलते इनके घर खत्म हो रहे है तो ये जानवर शहरों का रुख करने को मजबूर हो रहे है। गलती हमारी ही है क्योंकि आज हम इतने स्वार्थी हो गए है की अपने फायदे के लिए जंगल पे जंगल को काट रहे है ऐसे में जंगली जानवर कहाँ जायेंगे? हम अपने अशियानें के लिए उनका घर उजाड़ रहे है तो अब वो ही हमारे शहरों की तरफ बड़ रहे है। आजकल बाघ का आतंक लगातार बड़ रहा है। अभी कुछ समय पहले ही उत्तराखंड के यमकेश्वर में बसे एक गाऊं में बाघ का बेहद खतरनाक आतंक देखने को मिला, उसी गाऊं के 3 लोगों का शिकार कर चुका था वो लेकिन आज तक वन विभाग उसे पकड़ने में असफल रही है। अब मामले यूपी, हिमांचल से भी सामने आ रहे है जिससे अब सरकार की नींद उडी हुयी है। हर साल हमारे देश में बाघ के हमलों से लगभग दस हजार मौतें होती है और लाखों लोग घायल होते है। पहले ये जानवर रात को हमले करते दिखते थे लेकिन अब क्या दिन क्या रात? जंगली जानवरों के लिए अब सब समय एक ही है। हमारा देश बहुत ज्यादा खेती के ऊपर डिपेंड रहता है, किसान दिन रात मेहनत करके अपने खेतों पर अनाज बोते है लेकिन जंगली जानवरों के चलते इनके सारी खेती नष्ठ हो जाती है। सरकार के पास करोड़ों रुपए है लेकिन वो इतनी असमर्थ है की खेतों के लिए बिजली के तारों की वयवस्था कर सके। अगर प्रशाशन थोड़ा साथ दे तो किसानो का भला हो सकेगा। मेरे विचार में सबसे पहले प्रशाशन को बाघों के हमलो को रोकने के लिए वन विभाग की एक टीम बनानी चाहिए जो सिर्फ बाघों के लिए काम करे, और लोगों को उनके हमलों से बचाये। जिस जगह पर बाघ देखा गया है वहां चौबीसों घंटे वन विभाग को खोज बीन करनी चाहिए। अक्सर देखा जाता है की जब बाघ की खबर मिलती है तो प्रशाशन खोजबीन तो शुरू करता है लेकिन थोड़े देर बाद सब घर की तरफ चल लेते है। अरे वो बाघ है, आज नहीं तो कल फिर आएगा या कभी भी वापस आ सकता है। ऐसे में वन विभाग को और मुस्तैदी दिखाने की जरूरत है। 
          आज बाघ के हमलों से इंसान भी परेशान हो चुके है। हम इंसानों की गलती से जंगलों को तो नुक्सान हो ही रहा है लेकिन साथ ही साथ हमारी खुद की जिंदगियां भी खतरे में पड़ रही है।

Tuesday, 30 August 2016

शराबबंदी पर कानून फ़ैल..

हमारे देश में हमेसा से ही शराब सेवन को लेकर कानून सख्त रहा है लेकिन बावजूद उसके आज तक सरकार शराब पर पूरी तरह से पाबंदी नहीं कर सकी है। करण ये है की सरकार का शिकंजा सिर्फ सिमित जगहों तक ही रहा है जिसके चलते नामी इलाके तो सरकार और प्रशाशन की नजरों तक आ जाते है लेकिन छोटे कज्बों पर शराब बनती रहती है और बिकती है।
      

शराब को पब्लिकली बेचना या सेवन करना कानूनन अपराध है, अभी तक इसका उलंघन करने पर 10 हजार रुपए तक जुर्माना या फिर 6 महीने तक की सज़ा होती है लेकिन अब केंद्र सरकार ने शराबबंदी के लिए और सख्ती दिखाने जा रही है। अभी तक भले ही प्रशाशन इसमें फ़ैल साबित हुआ हो लेकिन उम्मीद की जा सकती है कि सख्ताई दिखाने से शराब पर पूर्ण तरह से पाबंदी लग सकती है। बिहार, हरयाणा राजस्थान में सरकार ने शराब सेवन को पूर्ण तरह से बंद कर दिया है लेकिन इसके बावजूद अभी भी रोजाना शराब तस्करी, या शराब पीने से मौतों की खबरें देखने को मिलती है। सरकार द्वारा अब शराबबंदी का उलंघन करने पर 1 लाख रुपए तक का जुर्माना और 10 साल से लेकर उम्र कैद तक की सज़ा हो सकती है। सरकार द्वारा पहले ही इस बात को साफ़ किया गया है की सार्वजानिक जगहों पर यानि स्कूल या कॉलज परिसर, हॉस्पिटल या किसी भी ऑफिस में शराब का सेवन करना कानूनन अपराध है। अगर किसी काम काजी ऑफिस में शराब सेवन किया जाता है तो इस मामले में ऑफिस के हैड और उच्च कर्मचारियों को भी सजा मिल सकती है। इतनी सख्ती के बावजूद रोजाना हमारे देश में हजारों लोग अपने स्वास्थ्य से खेल रहे है। आज शराब सेवन को रोकने के लिए हजारों संस्थान सामने आ चुके है, लाखों लोग इसे रोकने में लगे हुए है लेकिन अभी भी कोई खास सफलता इसमें नहीं मिली है।
          सरकार अपनी तरफ से पूरा काम करती है, लेकिन थोडा प्रशाशन भी अगर इसमें सख्ती दिखाए तो हर छोटे-छोटे शेहरो और कज्बों पे हो रही शराब की तस्करी और मिलावटी शराब के उत्पाद को रोका जा सकता है। शराब सेवन से आज तक करोड़ों लोगों की हस्ती खेलती जिंदगियां बर्बाद हो चुकी है, परिवार के परिवार खत्म हो चुके है क्योंकि शराब बेहद हानिकारक पदार्थ है। अगर सरकार इसमें पूरी तरह से पाबंदी लगाने में कामयाब होती है तो हमारे समाज को , हमारे देश को काफी हद तक फायदा मिलेगा और हमारे भारत का हर परिवार खुशहाली से अपना जीवन व्यतीक कर सकेगा।

Monday, 29 August 2016

करोड़ो की एजुकेशन..

आज से 20-25 साल पहले की बात करे तो तब हमारे देश में पढ़ाई इतनी ज्यादा महंगी नहीं थी जितनी आज की तारीक में है। आज मेहंगाई की मार झेल रही जनता के लिए बच्चों को इंटर तक पढ़ाना भी चुनोती बन चुका है। एक तरफ प्राइवेट स्कूलों की मनमानी बढ़ती ही जा रही है और सरकारी स्कूलों में तो एडमिशन वैसे ही मुश्किल से होता है। आज एजुकेशन लगभग करोड़ों रुपए की हो चुकी है। 15 साल पहले तक डॉक्टरी की पढ़ाई 10 लाख तक में पूरी होती थी तो वहीँ आज डॉक्टरी यानि की MBBS की पढ़ाई एक अच्छे प्राइवेट में डेढ़ से दो करोड़ रुपए में हो रही है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई से लेकर हाइयर एजुकेशन तक सब लाखों करोड़ों की हो गयी है इसलिए आज एजुकेशन हर किसीके लिए मुमकिन नहीं हो पा रही है।आपको जानकर बड़ी हैरानी होगी की इस वक़्त विश्व के सबसे महंगे यूनिवर्सिटीज में एडमिशन के लिए लाखों रुपए डोनेशन के रूप में देने होते है और सालाना इनमें सिर्फ पढ़ाई-पढ़ाई के 35 से 40 लाख रुपए लगते है। चाहे भारत के IIT हो या अमेरिका का कैम्ब्रिज कॉलज या ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी, इनमे एडमिशन लेना शायद हर स्टूडेंट का सपना होता है लेकिन इनमे एडमिशन के लिए जेब में करोड़ों रुपए की जरूरत पड़ती है। माना जाता है की ऑक्सफ़ोर्ड, कैम्ब्रिज और कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी ये दुनिया के सबसे महँगे कॉलज है जिनमे पढ़ाई करोड़ों की होती है। 
        हमारे भारत में भी इस वक़्त IIT, IIM और सिम्बोइस को सबसे महँगे कॉलज में गिना जाता है, लेकिन ऐसा नहीं है की यहाँ बस पैसे ही लगते है यहाँ पढ़ाई भी उच्च स्थर की होती है। कुछ दिनों पहले ही शोध में सामने आया की भारत के उच्च कॉलज से MBBS की पढ़ाई लगभग 2 करोड़ में हो रही है। ऐसे में ये अंदाजा लगाया जा सकता है की किसी ज़माने में हजारों में होने वाली पढ़ाई आज करोड़ों की हो चुकी है। मिडिल क्लास और गरीब वर्ग के लोगों के लिए उच्च कॉलज का हिस्सा बनना बस एक सपना बनकर रह जाता है। स्कूलों की मनमानी के भी आज सब परेशान है, आये दिन प्रोजेक्ट के लिए रुपए, नए नए चार्ट और एक्सिबिशन के लिए रुपए, मॉडल बनाने के लिए रुपए, हर 2 दिन में प्रोग्राम के लिए रुपए। ऐसे में अभिभावकों के लिए रोजाना खर्च निकलना मुश्किल होता जा रहा है। आज मेहंगाई से पूरा देश परेशान है, दाल-सब्जी से लेकर पढ़ाई तक सब कुछ महंगा है।आज एजुकेशन करोड़ों की हो चुकी है रो की आने वाले समय में और बड़ सकती है।

Friday, 26 August 2016

सरोगेसी पर कानून सख्त..

आज पूरी दुनिया में हजारो लाखों दंपति ऐसे है जो बच्चों के सुख से परे है, ऐसे दंपति सरोगेसी का सहारा लेते है यानी किराये की गोद। ये कानून भारत में इसलिए लाया गया था ताकि निसंतान दंपति को संतान सुख मिल सके। पहली बार भारत में 1994 मार्च, में सरोगेसी का प्रयोग किया गया था। तब से आज तक लाखों लोगों को इससे मदद पहुँची है लेकिन अब सरोगेसी पर कानून कड़ा हो चुका है क्योंकि लगातार सरोगेसी की आड़ में निजी अस्पताल और संस्था गलत तरीके से पैसे कमाने का काम कर रही है। 
       आज सरोगेसी पर कानून इसलिए सख्ती दिखने को मजबूर है क्योंकि आज इस में गंदगी फ़ैल चुकी है। बहुत बार देखने को मिला है कि आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को शेहरो में काम दिलाने के बहाने सरोगेसी में धकेल दिया जाता है। कमजोर वर्ग की महिलाओं के लिए सरोगेसी शोषण का जरिया बन चुकी है। आज इसका कारोबार एक अरब से भी ज्यादा का हो चूका ह, ये कारोबार निजी चिकित्सकों और दलालो के जरिये चलता है लेकिन सरकार इसमें अंकुश लगाने में अभी तक विफल साबित हुयी है। लेकिन अब सरकार इसमें ज्यादा से ज्यादा सख्ती दिखने लगी है जिसके चलते अब केंद्र सरकार ने ये प्रावधान निकाला है की अब से सिर्फ रिश्तेदार में महिला ही किराये की कोख दे सकती है वो भी सिर्फ एक बार। इस कानून के अंतर्गत अब सरोगेसी को बेहतर तरह से चलाया जायेगा ताकि इसकी आड़ में कोई गलत काम न हो सके। आपको जानकर हैरानी जरूर होगी की भारत में सरोगेसी के लिए दवाइयाँ और अस्पताल थोड़े सस्ते है यही वजय है की विदेशी दंपति भी सरोगेसी के लिए भारत का रुख करते है।
         हमारे समाज में बहुत से नियम है, सरकार द्वारा बहुत से कानून बनाये गए है लेकिन इनका पालन शायद ही कोई करता हो। सरोगेसी को मानव के हित के लिए प्रावधान में लाया गया है तो हमारी भी जिम्मेदारी बनती है की हम अपने सरकार के नियमों का पालन करे।  

Thursday, 25 August 2016

हमारी स्वास्थ्य सेवा की बदहाली..

भारत हमारा देश जो बड़ी रफ़्तार से प्रगति की तरफ बड़ रहा है,  आजादी के 70 साल पूरे हो गए है ऐसे में आज पूरा विश्व हमारी ताकत देख चुका है लेकिन अंदर की बात कौन जनता है? अंदर की बात यानी की हमारी सरकार का सिस्टम। सरकार एक देश को चलाती है लेकिन अगर वही सरकार सुस्त सिस्टम के भेंट चढ़ जाये तो देश का क्या हाल होगा ये आप अनुमान लगा सकते है। हर कोई चाहता है की उनके समाज और शहर को एक बेहतर स्वास्थ्य सेवा मिले, लेकिन सच्चाई कुछ और ही है?
        एक तरफ मोदी जी भारत को सबसे बेहतर और प्रभावी देश बनाना चाहते है, तो वहीँ हमारे देश की स्वास्थ्य सेवा की लगातार अनदेखी होती जा रही है । हालात इतने बुरे है की हमारे देश में 1650 लोगों के लिए सिर्फ एक डॉक्टर मौजूद है। गॉंव की बात तो छोड़िये, अभी तक शेहरो में भी बेहतर स्वास्थ्य सेवा मानो दूर के ढोल है। आपको जानकर बड़ी हैरानी होगी कि इस समय भारत में 7800 डॉक्टरों की कमी है और हर साल 27% लोग बदहाल स्वास्थ्य सेवा के चलते अपनी जिंदगी को खो देते है। ये आंकड़े इस बात को साफ़ बताते है की हमारे देश की स्वास्थ्य सेवा किस कदर बदहाल है। इसपे हर कोई बात करता है, हर कोई अपनी राय देता है लेकिन इस बदहाली को कोई ठीक नहीं करता। जब पूरा देश 25 अगस्त को कृष्ण जन्मआष्ट्मी के पर्व को हर्षोल्ला के साथ मना रहा था, उस समय ओड़िसा के कालाहांडी में एक आदमी अपनी मरी हुयी पत्नी के शव को 8 किमी पैदल, कंधो के सहारे घर लेकर जा रहा था। बताया जा रहा है की उसकी पत्नी सरकरी अस्पताल में टीबी के कारण दम तोड़ चुकी थी, उसके शव को घर पर लेजाने तक के लिए अस्पताल प्रशाशन द्वारा एम्बुलेंस तक मुहैय्या नहीं करायी गयी, तो मज़बूरी में उस बेबस पति को अपनी पत्नी के शव को खुद, कंधो के सहारे लेकर जाना पड़ा। जब अधिकारीयों के कान तक ये बात पहुँची तक उनके लिए एम्बुलेंस को भेजा गया। ये है हमारी स्वास्थ्य सेवा की तस्वीर। सरकार ने 100 नंबर को इमरजेंसी नंबर घोषित किया हुआ है, गेरेंटी है सरकार की कि 15 से 20 मिनिट के अंदर एम्बुलेंस की सुविधा शेहरो को और 30 मिनट के अंदर दूर कज्बों को मिलनी चाहिए, लेकिन इस गेरेंटी को हमेसा सबने फ़ैल होता ही देखा है।
       गरीब इंसान अपने परिवार का इलाज कहाँ कराये? प्राइवेट अस्पताल की फीस लाखों पे है और सरकारी अस्पताल की हालत पे खुद रोना आ जाता है। न डॉक्टर, न बेड, न कोई सुविधा, यहाँ तक की दवाइयाँ भी नहीं है। आखिर क्यों स्वास्थ्य सेवा को इतना अनदेखा किया जाता है, सरकार को चाहिए की स्वास्थ्य सेवा की इस दुर्दशा को जल्द से जल्द दुरुस्त करे, जल्द ही हर अस्पताल में डॉक्टर्स की तैनाती करे और हर घर तक एम्बुलेंस की सेवा को बढ़ाया जाये। क्योंकि सुस्त सिस्टम की मार और ऊपर से स्वास्थ्य सेवा की ये बदहाली मानो हमारे लिए किसी कोहराम से कम नहीं।

Wednesday, 24 August 2016

इंसानियत खोते इंसान...

आज कल हर कोई सिर्फ अपने आप से मतलब रखता है, सिर्फ खुद की ख़ुशी और जरुरत को ही वो अपना धर्म मानने लगा है। किसी दूसरे का दुःख दर्द के लिए आज किसी पे समय नहीं है क्योंकि आज हम इंसान तो कहलाते है लेकिन हमारी इंसानियत कहीं खो सी गयी है। 
       भगवन ने हर इंसान को एक जैसा बनाया है, हर किसी को वही दिल, वही आँखे और वही जज़्बात लेकिन हर कोई आज इंसान नहीं कहलाता। क्यों? आखिर क्यों इंसान होते हुए भी हमारे अंदर इंसानियत नहीं रही? क्योंकि आज हर इंसान दौलत,शोहरत के पीछे पगलों की तरह भाग रहा है। इंसान ये भी भूल जाता है की जिस दौलत के लिए वो अपनो को छोड़ने के लिए तैयार है एक दिन वो भी उस दौलत को छोड़ के चला जायेगा। आज कल इंसान सिर्फ तीन चेजों पे मरता है, दौलत दौलत और बेहिसाब दौलत। उसकी जिंदगी बस दौलत कमाने में ही निकल जाती है। बात भी सही है कि बिना दौलत आज कुछ भी नहीं, दौलत सब कुछ तो दे सकती है लेकिन शांति नहीं। आज हमे किसी का दुःख नहीं देखते क्योंकि आखों में पैसों का पट्टा लगा हुआ है। जब किसी बड़े हॉस्पिटल में किसी इंसान को इमरजेंसी होती है तो पहले वहां बड़ी रकम जमा करनी पड़ती है, इलाज तब शुरू होता है। पहले रुपए फिर इलाज, ये किस्से अक्सर देखे जाता है।रोड किनारे किसीका एक्सीडेंट हो जाये, तो लोगों की भीड़ तो ऐसी लगती है जैसे उन्हें ही इलाज करना है, लेकिन जब बात आती है उसे उठाके अस्पताल लेकर जाने की तब हम कोशिश करते है की हमे कोई न बोल दे इसे उठाने के लिए। क्योंकि हमे अपना काम, अपना समय उसकी जिंदगी से कई गुना ज्यादा कीमती लगती है।
           इंसान पहले ऐसा था, न पहले इस तरह पैसों की भूख थी, वक़्त के साथ साथ इंसान भी बदला और उसका चरित्र भी। कहा जाता है कि "नेकी कर और दरिया में डाल" लेकिन आज दरिया में सिर्फ प्लास्टिक या पॉलीथीन ही डाला जाता है क्योंकि नेकी कोई करता ही नहीं। लेकिन उसके बावजूद भी हम भगवन  के प्रति अपनी आस्था पूरी रखते है। भगवन के द्वार पे जोर जोर से भजन-किर्तन करते है, वो सुने न सुने पूरा शहर सुन लेता है की आज वहां भजन हो रहा हैं । लेकिन वहीँ पास में एक भूखा इंसान भीख मांगने को मजबूर बेठा है उसकी तरफ कोई नहीं देखता। जब भी कोई खास त्यौहार होता है तो भगवन के मंदिरों पर लाखों लीटर दूध, मक्खन डाला जाता है। लेकिन उसकी जगह किसी गरीब इंसान को एक रोटी देने के लिए बोलो तो वहीँ इंसान मुँह फेर लेता है। अपने परिवार की ख़ुशी की कामना तो हर कोई करता है लेकिन कभी उनके बारे में सोचा है जिन्हें असल में आपके सहारे की जरूरत है। भगवन के प्रति आस्था बिलकुल सही है, इसमें कुछ गलत नहीं है लेकिन इंसानियत के नाते ही सही हमेसा जरूरतमंद की मदद करना हमारा पहला कर्तव्य होना चाहिए क्योंकि इंसानियत ही हमारा धर्म है।

Tuesday, 23 August 2016

क्यों फसता है आपदा में उत्तराखंड?

हर साल मानसून के शुरू होते ही उत्तराखंड में आपदा की बरसात शुरू हो जाती है। कहीं बादल फटने की घटनाएं होती है, कहीं सड़क धस जाने की तो कहीं बिजली गिरने की। प्रशाशन हर बार खुद को चोक्कना और पूरी तरह से तैयार बताने के दावे करता है तो फिर क्यों हर बार तस्वीर इतनी भयानक हो जाती है? 


       उत्तराखंड में पहले भी ऐसी बहुत सी घटनाएं सामने आती थी, मगर पिछले कुछ सालों से हालात बेहद गंभीर होते दिख रहे है। साल 2013 की वो प्राकर्तिक आपदा को कौन भूल सकता है जिसने उत्तराखंड को ऐसे घाव दिए जो आज तक नहीं भर सके । सवाल यही उठता है की आखिर क्यों हर बार उत्तराखंड ऐसी आपदा में बुरी तरह फसता है। कुछ जानकारों की माने तो जिस तरह पर्यावरण में परिवर्तन हो रहे है उसकी वजय से ये सारी घटनाएं हो रही है। तो कोई बढ़ते प्रदुषण से हो रही ग्लोबल वार्मिंग को इसका जिम्मेदार बता रहा है। 2013 से अभी तक बहुत सारी घटनाएं उत्तराखंड में सामने आ चुकी है जिसके चलते हजारों लोग प्रभावित हो चुके है। खासकर बरसात के शुरू होते ही उत्तराखंड में मानो आफत शुरू हो जाती है। इस साल यानि 2016 में भी हालात कुछ ठीक होते नहीं दिख रहे है। मई तक सब कुछ ठीक चल रहा था , चार धाम यात्रा भी अपने चरम पर थी मगर मानसून के आते ही एक बार फिर उत्तराखंड आपदा में फसता हुआ नजर आ रहा है। हर बार की तरह सरकार और प्रशाशन ने खुद को पूरी तरह से तैयार बताया मगर शुरुवात में ही हुयी बारिश से प्रशाशन के सारे पोल खुल गए। कहीं घर धस गए, कहीं सड़कें ही बाढ़ के पानी के पानी के साथ बेह गयी,  तो कहीं जिंदगियां भी आपदा के आगे बेबस नजर आये। पहाड़ों में रह रहे लोगों की जिंदगी वैसे ही बहुत मुश्किल होती है, ऊपर से ये आफत की बारिश मानो उनके लिए किसी अभिशाप से कम नहीं। उनके घर, खेत और जीवन भर की कुंजी सब कुछ आपदा के भेंट चढ़ जाती है। सरकार उन्हें 1-2 लाख रुपए देकर खुद को जिम्मेदार बता देता है। मगर सरकार शायद ये नहीं सोचती की ये लाख दो लाख रुपए कब तक इनका साथ देंगे।
सबको पता है की हर बार इस तरह की घटनाएं होती है, तो फिर क्यों हर बार सब कुछ तहस नहस हो जाता है। क्या हमारी सरकार, हमारा प्रशाशन इतना कमजोर है की वो इस भयानक तस्वीर को बनने से न रोक सके।

चिकत्सकों का इंतजार कर रहे पहाड़..

कहने को तो सरकार सारे वादे करती है, घोसनाएं करती है, जनता को सपने तक दिखती है, लेकिन जब जमीनी हकीक़त पे काम करने की बारी आती है तो सरकार सी सुस्ती पड़ जाती है। बात करे पहाड़ों की, तो पहाड़ों पे मूलभूत सुविधाएं पहुँचने की गारन्टी तो सरकार देती है लेकिम सच्चाई ये है की अभी तक हमारे पहाड़ सुविधाओं का बस इंतजार कर रही है। 
        हमारे पहाड़ ही हमारी पहचान है, बिना पहाड़ कैसा उत्तराखंड? मगर सरकारी वादों का इंतजार कर रहे पहाड़ अब थक चुके है। ना ही सरकारी मदद यहाँ पहुँच पाती है ना की कोई आधुनिक काम। बात करे चिकित्सकों की तो हमारे पहाड़ों पर आज भी इनकी बेहद कमी है। पहाड़ों पर रेह रहे हजारो-लाखों लोगों के लिए ये बेहद गंभीर विषय बनता जा रहा है क्योंकि जरूरत के समय न ही अच्छा अस्पताल यहाँ मिलता है ना ही डॉक्टर्स। ऐसे में यहाँ के लोगों के लिए मुसीबतें और बड़ जाती है। हमारे पहाड़ हमेसा से ही चिकित्सकों का इंतजार कर ने को मजबूर है क्योंकि तमाम घोसनायों के बावजूद यहाँ ना मेडिकल सुविधा पहुँची है ना ही डॉक्टर।
         जब पहाड़ पर कोई हादसा या किसी की तबियत बिगड़ती है तो उसे शेहर की तरफ लाया जाता है क्योंकि शेहरो में आधुनिक सुविधाएं और अच्छे चिकित्सक मौजूद है। लेकिन हर कोई इतना खुदकिस्मत नहीं होता। बहुत बार पहाड़ से शहर तक लाने में ही बहुत लोग अपनी जिंदगी खो देते है क्योंकि शेहरो तक मरीजों को लाने में बहुत समय लगता है । ऐसे में वो भी पुरे रास्ते यही सोचता होगा की आखिर कब यहाँ अस्पताल बनेंगे और कब यहाँ चिकित्सक पहुँचेंगे? सरकार कहने को तो कहती है की हम पहाड़ों तक हर सुविधा पहुचाएंगे, लेकिन ये नहीं कहती की कब पहुचाएंगे? हमारे पहाड़ पे जिंदगी वैसे ही इतनी मुश्किल होती है ऐसे में मूलभूत सुविधाओं का ना होना उनके लिए ओर मुश्किल पैदा करता है। सरकार को बुलेट ट्रेन, फ्री वाईफाई, काला धन के अलावा हमारे पहाड़ों के बारे में भी सोचना चाहिए।

Sunday, 21 August 2016

मत छीनो बचपन..

बचपन हर किसी के जिंदगी का सबसे ख़ास स्टेज होता है, बचपन यानी खेलने कूदने की उम्र, हर पल मस्ती और किसी भी तरह का कोई दवाब नहीं। आज की भागदोड़ भरी जिंदगी से दो मिनट निकालकर जरा बचपन के दिनों के बारे में सोचो। न किसी बात की चिंता, न कोई जिम्मेदारी बस मस्ती। 
      लेकिन देश में बढ़ती गरीबी के साथ साथ लाखों बच्चों का बचपन उनसे छिन रहा है। एक परिवार में कोई कामने वाला नहीं होता तो उस घर के छोटे छोटे बच्चे बचपन से ही मजदूरी करना शुरू कर देते है। लेकिन उनके माँ बाप को इससे कोई तकलीफ नहीं होती क्योंकि घर चलाने के लिए सिर्फ पिता के पैसे पूरे नहीं हो पाते इसलिए अपने बचपन को भूलकर छोटे बच्चे भी काम पे लग जाते है। काम चाहे कैसा भी हो, होटल या ढाबे पर बर्तन धोना, मजदूरी करना या किसी ठेल्ली पे काम करना, उन्हें इससे कोई मतलब नहीं बस किसी तरह उनका पेट पल जाये। हर बाप चाहता है की उनका बच्चा बचपन से अच्छे से पढे, ताकि बड़े होकर वो एक अच्छी जिंदगी बिता सके लेकिन गरीबी ने इस कदर लोगों को सताया है की ये अरमान उनके मन में ही दम तोड़ देता है। और ऊपर से सरकार का ढीलापन मानो उनकी जिंदगी को और कठिन क्र देता है। वो सरकार से उम्मीद ही नहीं लगाते क्योंकि वो अच्छे से जानते है की जितने समय में सरकार तक उनकी बात पहुँचेगी तब तक उनका परिवार अपना अस्तित्व खो चुका होगा। इसलिए वो सरकार बरोसे नहीं रहते और अपने छोटे छोटे बच्चों को मजदूरी पे भेज देते है।
            मैंने एक बार गरीब बच्चे से पूछा था कि की तुम स्कूल क्यों नहीं जाते? तो उसने कहा की स्कूल जाने के लिए भी पैसे नहीं है उनके माँ बाप के पास इसलिए वो चाय की ठेल्ली पे काम करने को मजबूर है। आज हमारा देश तरक्की की राह पर अग्रसर है लेकिन गरीब वर्ग तक हर किसी कि आँखें नहीं पहुँचती। जिस उम्र में बच्चों को पढ़ाई करने के लिए स्कूल भेजना चाहिए उस उम्र के लाखों बच्चे आज बाल मजदूरी को झेल रहे है क्योंकि भारत में ग़रीबी बीमारी की तरह फ़ैल रही है। सरकार सुन तो रही है लेकिन देख नहीं रही है, छोटे बच्चों से बड़ी उम्मीद रखनी चाहिए न ही दो पैसे के लिए उनका बचपन छीन लेना चाहिए।

Saturday, 20 August 2016

सियाचिन की सच्चाई..

हम लोग अपने अपने घरों में बैठकर आराम से खाना खाते है, टीवी देखते है अपना जीवन बड़े आराम से बिता रहे है। ये सब सिर्फ उन सैनिकों की बदौलत जो हर पल सीमा पर बन्दूक ताने खड़े रहते है, हर समय उनकी आँखें दुश्मनो की हर गतिविधियों पे रहती है। उन तमाम सैनिकों की वजय से ही हम देश के अंदर सुरक्षित

अपने अपने घरों में आराम से रेह रहे है। लेकिन क्या आपको मालूम है की हमारे सैनिक किन परिस्थितियों में रहते है। समुद्र के 3 किमी निचे से सियाचिन के 20000 फ़ीट की ऊँचाई तक हर जगह से हमारे देश को दुश्मनो से बचाते है हमारे सैनिक। 
         वैसे तो पूरे भारत में सैनिकों की जिंदगी बेहद खतरनाक और संवेदनशील होती है लेकिन आज बात करते है दुनिया के सबसे ऊँचे युद्धभूमि में जिसका नाम है"सियाचिन बॉर्डर"
कश्मीर से सटे इस इलाके तो दुनिया का सबसे ऊँचा युद्धस्तल माना जाता है । सियाचिन से चीन और पाकिस्तान के बॉर्डर जुड़े है ऐसे में यहाँ हर समय दुश्मनो का खतरा बना रहता है। सियाचिन में रेह रहे भारतीय सैनिकों की जिंदगी बेहद खतरनाक रहती है, दुर्गम रस्ते और परिस्थितियां यहाँ तैनात सैनिकों के लिए मुश्किल बनते रहते है। पल पल बदलता मौसम, खून जमा देने वाली ठंड और बर्फीला तूफ़ान ये सब यहाँ आम बात है। बताया जाता है की यहाँ साल भर बर्फ पड़ती रहती है है, लेकिन सितम्बर से अप्रैल तक यहाँ तापमान माइनस 55 डिग्री तक पहुँच जाता है। माइनस 55 डिग्री मतलब आम इंसान का जिन्दा रहना लगभग ना के बराबर। इतनी कड़ाके की ठंड में यहाँ हमारे सैनिक देश की रक्षा में हमेसा खड़ा रहते है। जानकर हैरानी जरूर होगी कि भारत सरकार यहाँ तैनात फौजियों पे प्रतिदिन 1 करोड रुपए खर्च करती है। क्योंकि सियाचिन तक पहुँचना हर किसीकि बात नहीं है, इतनी ऊँचाई पे न ही खाने का कुछ सामान टिकता है ना ही ऑक्सीजन मिल पाती है। कहते है की पूरे भारत में एक रोटी की कीमत 4-5 रुपए है लेकिन जब वही रोटी सियाचिन में सेनिकों के लिए पहुचती है तो उस रोटी की कीमत 300 रुपए हो जाती है। सियाचिन को सबसे ठंडी जगह माना जाता है, यहाँ रोज़ाना बर्फीले तूफ़ान अपना तांडव दिखती है। यहाँ पे रेह रहे सेनिकों तक खाना पहुँचना भी भारत सरकार के लिए किसी चुनोती से कम नहीं होता, क्योंकि इतने अधिक तापमान में खाना खराब हो जाता है और इतनी ऊँचाई तक वायुसेना के विमान को पहुँचने में बड़ी मस्सकत करनी पड़ती है। सियाचिन पे सैनिकों के कपड़ों की कीमत एक लाख की होती है ये बेहद खास तरह के कपड़े होते है जो की इतनी ठंड को झेल सके, साथ ही इतने लिए खाने में सिर्फ ब्रेड, अंडे और रोटी ही दिए जाते है क्योंकि हर तरह का खाना इतनी ठंड नहीं झेल सकता। सियाचिन के सेनिक बताते है कि यहाँ इतनी ठंड होती है की हमे ये पता ही नहीं चलता की हमारे पास जीब भी है, क्योंकि जीब इतनी ठंड से सुन्न पड़ जाती है और उसपे किसी चीज का स्वाद नहीं पता चलता। न ही मीठे का न ही मिर्च का।
       इन बातों से आप अंदाजा लगा सकते है की सियाचिन पे तैनात हमारे सैनिक किन परिस्तिथियों में रहते है। उनका हर एक दिन उनके लिए कड़ी चुनोती भरा होता है।

इसलिए नहीं मिलता ओलंपिक में गोल्ड...

हर साल की तरह इस बार भी ओलंपिक में भारत ने ख़ास प्रदर्शन नहीं किया, इस बार भी भारत गोल्ड पदक के लिए इन्तजार ही कर रहा है, लेकिन क्या भारत में किसी एथलीट को इस तरह से ट्रैंएड किया जाता है की वो भारत को स्वर्ण पदक दिला सके? शायद नहीं, बिलकुल भी नहीं। 
         हमारे देश में एक कहावत सबने सुनि हुयी है " पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब" शायद इस कहावत को हमारा समाज और हमारा सिस्टम दिल से ले लिया है। तभी भारतइ स्पोर्ट्स को कैरियर के तौर पे नहीं देखा जाता। और पूरे 130 करोड़ भारतीय उम्मीद करते है की ओलंपिक जैसे मैदान में भारत को झोली में गोल्ड, रजत या कांस्य पदक आएगा। आखिर इतनी उम्मीद क्यों? जबकि यहाँ खिलाड़ियों की क्या दुर्दशा है इस बात को हर कोई जनता है। आपको जानकर हैरानी होगी की भारत में हर दिन एक एथलीट पे सिर्फ तीन पैसे खर्च करती है हमारी भारत सरकार। वहीँ अमेरिका और चीन जैसे देशों में प्रतिदिन खिलाड़ियों पे 22 से 25 रुपए खर्च किये जाते है। इन आकड़ों से आप अंदाजा लगा सकते है की भारत सरकार खिलाडियों पे कितना ध्यान देती है? अमेरिका,चीन जापान जैसे देशों में हर बार खिलाडी लगभग 100 पदक लेकर जाते है या इससे भी ज्यादा, तो वहीँ भारत में मुश्किल से 2-3 पदक ही आते है। सरकार की मायूसी और सुस्त सिस्टम के चलते यहाँ खिलाड़ीयों का मनोबल के साथ साथ उनका प्रदर्शन भी लगातार गिर रहा है। चीन में एथलीट को 4-5 साल की उम्र से ही स्पोर्ट्स के गुण सिखाये जाते है, तो वहीँ भारत में पहले पढ़ाई फिर खेलों की तरफ देखा जाता है।
       आज पूरा भारत रियो ओलंपिक में भारत के एथलीटोसों पदक की उम्मीद लगाये बेठा है लेकिन सच्चाई तो सभी तो मालूम है को आखिर तक कितने पदक हमारे पास आएंगे। हमारी सरकार तो बिलकुल ही नाराज है, अगर कोई खिलाड़ी मैडल लेकर आये तो उसे लगभग 5-6 करोड़ रुपए इनाम में दिए जाते है। अगर सरकार हर खिलाडी में सिर्फ लाख रुपए भी ट्रेनिंग में खर्च करे तो हमारे एथलीट ओलंपिक में बेहतर प्रदर्शन कर सकेंगे क्योंकि इससे उन्हें बेहतर ट्रेनिंग के साथ साथ आधुनिक सुविधाएं भी मिल सकेंगी। आज भारत मैडल के लिए तड़प रहा है क्योंकि तैयारियों में सरकार की तरफ से कमी साफ़ देखी जा रही है। अगर भारत सरकार सही तरीके से स्पोर्ट्स को बढ़ावा दे तो निस्चित तौर से भारत को स्वर्ण,रजत और कांस्य पदक का इतना इन्तजार नहीं करना पड़ेगा।

Friday, 19 August 2016

बचपन की राखी

हमारा बचपन बहुत सी यादों के साथ बीतता है। बचपन में छोटी छोटी बातों पे रोना और बिना किसी बात की फ़िक्र करके जीना। अच्छा और जब कोई त्यौहार आ जाये तो सबसे ज्यादा मज़े बच्चों के हो जाते है। नए कपड़े पहनकर एक से दूसरे कमरे में भागते रहना और मिठाई खाते रहना। ऐसे ही एक त्यौहार है राखी यानी रक्षाबंधन जिसका इन्तजार हर बहन करती है। 
          बचपन की राखी और आज में बहुत ज्यादा फ़र्क हो चुका है। बचपन की राखी..मुझे आज भी याद है जब में 7 साल का था तो राखी का बहुत ज्यादा इन्तजार करता था क्योंकि मुझे अलग अलग तरह की राखी को पहनने का बड़ा शॉक था। रक्षाबंधन से 2-3 दिन पहले से ही में सोच लेता था की मुझे कौन कौन सी राखियाँ पहननी है। मुझे तो बचपन में राखियों में सबसे ज्यादा घड़ी वाली राखी पहनने में बड़ा अच्छा लगता था। हर बार में अपनी छोटी बहन को बोलता था की घड़ी वाली राखी ही लेकर आना क्योंकि में उसको राखी भी मानता था और घड़ी भी समझ लेता था। भले ही उसमे हमेसा एक ही टाइम होता था लेकिन बचपन में क्या टाइम देखना। बस हाथों में घड़ी होनी चाहिए दोस्तों को दिखाने के लिए। घड़ी वाली राखी के साथ साथ एक और तरह की राखी मुझे बेहद पसंद थी, जिसमे टेडी बना रहता है। लेकिन वो राखी बड़ी मुश्किल से मिलती थी, 20 दुकानों में जाकर ढूंढना पड़ता था फिर मिलती थी किसी खास दूकान में।
               बचपन की राखी से एक और बात याद आई है। जब हम छोटे थी तब राखियों का बड़ा शोक हुआ करता था। साथ के दोस्तों से शर्त लगाई जाती थी की किसके हाथों में ज्यादा राखी है। में कोशिश करता था की जितनी ज्यादा राखी बंधवा सकूँ तो अच्छा है। और अगर मुझे लगता था की में शर्त हार रहा हूँ, तो में खुद ही बहुत सारी राखियाँ पहन लेता था और पूरी कलाई राखियों से भर जाती थी। स्कूल में भी में सबको कहा करता था की सब मुझे राखी पहनाओ, क्योंकि हमारी शर्त जो लगी थी।
ये तो थी बचपन की बातें लेकिन आज न बचपन रहा न ही वो बचपन की राखियाँ, न घड़ी न ही टेडी। आज भी जब में वो सब बातें सोचता हूँ तो लगता है की बचपन बहुत मासूम होता है। क्योंकि आज में सिर्फ अपनी बहन के हाथो से राखी पहनना पसन्द करता हूँ, राखियों से हाथ भर जाये अब ये मुझे भाता नहीं है। और न ही अब में अपनी कॉलज की लड़कियों को कहता हूँ की मुझे राखी पहनाओ। हसीं भी आती है सोचकर लेकिन याद भी करता हु उन दिनों को जब राखी को हम घड़ी समझकर पहना करते थे। बचपन की राखी आज भी याद है और शायद जिंदगी भर याद रहेगी।

Wednesday, 17 August 2016

हमे तो फेसबुक ने लूटा.. गैरों में कहाँ दम था।

हमे तो फेसबुक ने लूटा,गैरों में कहाँ दम था... माना जाता है की टेक्नोलॉजी ने आज के दौर में सब कुछ आसान कर दिया है। हजारों चीज़ दी है हमे टेक्नोलॉजी ने, उन्ही में से एक है फेसबुक। फेसबुक एक सोशल नेटवर्किंग साईट है जो कि 2008 में भारत आया था, और 2016 तक भारत में इसके लगभग 70 करोड़ यूज़र्स है। आजकल फेसबुक ही यूथ के लिए सब कुछ है। उनकी आन मान और शान।
        आजकल बच्चे पड़ना लिखना बाद में सीखते है पहले फेसबुक चलाना जानते है। नए नए दोस्त बनाना, फ़ोटोज़ शेयर करना, बातें करना ये सब आज कल फेसबुक की वजय से ही मुमकिन हो पाया है। फेसबुक के माध्यम से हम दूर देशों में बेठे अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से बातचीत कर सकते है। लेकिन ऐसा नहीं है की इसके सिर्फ फायदे ही है। ये जितना फायदेमन्द है उतना ही नुकसानदायक भी। आजकल फेसबुक दो तरीके से यूज़ हो रहे है। पहला बातचीत और फ़ोटो शेयर करने के लिए और दूसरा साइबर क्राइम के लिए। फेसबुक में आज बहुत सरे गुनाह भी हो रहे है,उन्ही में से एक है साइबर क्राइम। इसमें इंटरनेट के माध्यम से जो जो गुनाह होते है वो ही इसमें आते है। जैसे ही हैकिंग, ब्लैकमेलिंग और फ्रोड केस। अक्सर हम टेलीविज़न और न्यूसपेपर में पड़ते है की किस तरह टीनएजर्स इंटरनेट के जरिये गलत काम में पद जाते है और गुमराह हो जाते है। बहुत बार लड़कियों की तस्वीरों को एडिट करके उन्हें गलत तरीके से शेयर कर दिया जाता है या कभी किसी की प्राइवेट वीडियो को फेसबुक पे अपलोड कर दिया जाता है। ये सब साइबर क्राइम होते है। आपको जानकर बेहद हैरानी होगी की साइबर क्राइम में पकड़े गए गुनहगारों में से 90% स्कूल और कॉलज में पढ़ने वाले स्टूडेंट होते है। क्योंकि इसी उम्र में बच्चे सबसे ज्यादा इन चीजों की तरफ अट्रैक्ट होते है।
       फेसबुक एक और चीज के लिए बेहद फेमस है। वो है रिश्ते करवाने में। आजकल 85 प्रतिशत यूथ की gf-bf फेसबुक के माध्यम से ही बनते है। फेसबुक में दिन रात दोस्तों से बातें करना, नयी नयी फ़ोटोज़ और सेल्फी को अपलोड करना, लाइक और कमेंट करना किसे पसंद नहीं है। ऐसे में रोजाना नए नए दोस्त बनते है, और उनसे बातें शुरू हो जाती है। फेसबुक को सिर्फ सूचनाएं और बातों के लिए बनाया गया था लेकिन किसे मालूम था की फेसबुक एक समय में युवाओं को गुमराह करने में भी साथ देगा। फेसबुक बेहद खास और काम की चीज है ऐसे में इसका सही इस्तमाल करना सबको आना चाहिए। फेसबुक में ना किसी पे जल्दी विस्वास करे और ना ही किसी को अपना पासवर्ड बताये क्योंकि हमारी एक छोटी की गलती सब कुछ बर्बाद कर सकती है।

Tuesday, 16 August 2016

अतिथि देवो भवः

हमे हमेसा से ही अपने मेहमानों का आदर करना सिखाया जाता है, चाहे मेहमान उम्र में बड़े हो या छोटे वो भगवान का रूप होता है इसलिए उनका आदर और सम्मान करना हम सभी का कर्तव्य है। बचपन से ही हमारे घरों में जब भी कोई मेहमान आता है, तब उन्हें नमस्कार करना और उनका सम्मान करना ये सब संस्कार हमे सिखाये जाते है। क्योंकि बड़े लोग केह गए है कि अतिथि देवो भवः इसका मतलब की मेहमान भगवन होते है। जिस तरह हम अपने भगवान को पूजते है उनकी दिल से इज्जत और सम्मान करते है उसी तरह हमारे देश में मेहमान को भी भगवन का दर्जा दिया जाता है। जैसे हमारे घर पे मेहमान आते है वैसे ही हमारा भारत भी हमारा घर है और यहाँ रोजाना लाखों की संख्या में मेहमान,पर्यटक के रूप में आते है। वो हमारा देश घूमते है, यहाँ के लोगों को और उनकी संस्कृतियों को करीब से देखते है। जब भी कोई पर्यटक हमारे देश में आता है तो उनके मन में भारत की तस्वीर बनी होती है। लेकिन अफ़सोस की बात ये है कि कुछ गंदे लोगों के कारण जो तस्वीर पर्यटकों के मन में भारत को लेकर रहती है वो झूठी साबित हो जाती है। कुछ लोग भारत घूमने आये पर्यटकों के साथ बत्तमीजी और छेड़ छाड़ जैसे काम करते है और बहुत बार को उन्हें लूट भी लिया जाता है। ऐसे में उन पर्यटकों को बहुत मुसीबतों का सामना करना पड़ता है और भारत की अच्छी तस्वीर खराब हो जाती है। पूरे विश्व में भारत का बोलबाला है, करोड़ों पर्यटक हर साल भारत का दीदार करने आते है, हम उनके साथ जैसा बर्ताव करते है वो उन्हें हमेसा याद रहता है। अगर हम उनका सादर सम्मान करेंगे तो वो अपने देश जाकर भारत के लिए अच्छा बोलेंगे और हर बार यहाँ आएंगे। 
          बड़े शर्म की बात है की एक तरह हमे मेहमानो की इज्जत करने को सिखाया जाता है तो वहीँ कुछ मनचलों की वजय से पर्यटकों के साथ बलात्कार और छेड़ छाड़ जैसी वारदात सामने आती है। बहुत बार पर्यटकों को झूठा फसाया भी जाता है और उन्हें लूटा जाता है। तब शायद हम भूल जाते है की अतिथि देवो भवः। पता है पर्यटकों को हमारे देः में घूमने के लिए आना हमारे लिए कितना फायदेमंद है। उनके आने से हमारे देश में लाखों-करोड़ों लोगों को रोजगार मिलता है, उनके आने से करोड़ों लोगों की दुकान चलती है। भारत सरकार भी इन बातों को जानती है इसलिए विदेसी मेहमानो के लिए अलग से मंत्रालय बनाये गए है। हमारा देश बेहद ख़ूबसूरत है, यहाँ के लोग, शहर, संस्कृति , हवा,पहाड़ सब कुछ हमेसा से ही देश दुनिया के करोड़ों पर्यटकों को अपनी और आकर्षित करती है।
        कहते है हमे दूसरों के साथ वैसा ही वयवहार करना चाहिए जैसा की हम अपने साथ चाहते है। अगर हम अपने देश में आने वाले पर्यटकों के साथ अच्छा वयवहार करेंगे तो वो खुश हो कर वापस जायेंगे,फिर से आने के वादे के साथ। हम अपने घर पे आये हुए मेहमानो की इज्जत करते है तो क्यों विदेशो से आये हुए मेहमानों के साथ गलत करना? वो हमारे देश के मेहमान है उनकी इज्जत करना हर भारतीय का धर्म होना चाहिए।

Sunday, 14 August 2016

आज कल का प्यार....

चलते चलते यूँही रुक जाता हूँ में, बेठे बेठे यूँही खो जाता हूँ में, क्या यही प्यार है? बिलकुल नहीं। आज कल प्यार,लव,इश्क़ इन सबकी परिभाषा ही बदल चुकी है। आजकल लव लोगों के लिए एक जुखाम की तरह हो चूका है,जो कि आता जाता रहता है। न ही मन से कोई किसिको मानता है न ही इज्जत करता है। बस टाइम पास या अपना मतलब निकलना ही लव हो गया है। आज का प्यार, प्यार नहीं लगता बस कुछ दिनों का या कुछ महीनों का साथ होता है। इंसान हमेसा से ही प्यार का इच्छुक रहा है शायद यही कारण है की वो हमेसा प्यार की तलाश में भटकता रहता है, उसकी आँखें हमेसा उस प्यार को ढूंढने में लगी रहती है और जब वो प्यार उसे मिल जाता है तो उसे वो वक़्त बेहद खास लगने लगता है। लेकिन वक़्त के साथ साथ बहुत कुछ बदल जाता है। ये हम अक्सर देखते है, अपने आस-पास की वक़्त के साथ-साथ इंसान के जज्बात और इच्छाएं भी मौसम की तरह बदल जाती है। 
       आजकल प्यार मिलना किसी फ़िल्म का टिकट मिलने जितना आसान हो चुका है। घर से सोचकर निकलो की शाम तक तम्हे तम्हारा प्यार चाहिए तो शाम तक किसी न किसी गली या महोल्ले में इंसान को उसका प्यार मिल ही जाता है। आजकल प्यार सोशल साइट्स पे मिलना बहुत ज्यादा आसान हो चूका है। बस थोड़ी सी मेहनत और ढेर सारा प्यार। फेसबुक तो मानो मेट्रिमोनियल साईट बन चुका है जो की रोजाना हजारों लोगों का रिश्ता करवाता है। फेसबुक पे दोस्ती, व्हाट्सऐप पे बातें और शाम को मुलाकातें..फिर ये रोजाना चलता है। लेकिन कब तक? क्या आज जिस इंसान के लिए तुम रात भर जाग रहे हो, इतना खर्चा कर रहे हो, अपने दोस्तों तक को भूल रहे हो क्या वो इंसान हमेसा तुम्हारा साथ देगा? शायद नहीं। लेकिन ऐसा नहीं है की आजकल प्यार को घूमना-फिरना तक ही देखे, बहुत लोग है जो दोस्ती से शुरुवात करते है और फिर साथ साथ भूड़े हो जाते है। लेकिन ये बेहद कम देखा जाता है वरना आज कल प्यार का पहला किस्सा 8वीं -9वीं कक्षा में शुरू हो जाता है और जवानी तक आकंड़ा 50 पार भी कर लेता है। आजकल प्यार बस फेसबुक या व्हाट्सऐप तक ही सीमित रह चुका है। धोखा मिलना तो मानो युवाओं का जन्म सिद्ध अधिकार बन चुका है। चाहे लड़के को या लड़कियां आजकल प्यार को सिर्फ एक खेल की तरह ही लेते है, जिसने दोनों जीतना चाहते है लेकिन हमेसा जीत सिर्फ एक की ही होती है।
         20-25 साल पहले सुनने में आता था की पहला-पहला प्यार है पहली-पहली बार है.. लेकिन आज कल प्यार 15वीं बार तक पहुँच जाता है और अगर इस समय तक उसकी शादी नहीं हुई तो इसका आंकड़ा और भी आगे बड़ जाता है। मतलब साफ़ है की आजकल युवाओं में सिर्फ अट्रैक्शन को ही प्यार का रूप माना जाता है। इसके आगे ना वो सोचते है ना ही बढ़ते है। आजकल लव सिर्फ इंटरनेट के बरोसे ही चलता है क्योंकि बिना फेसबुक, बिना व्हाट्सऐप प्यार आजकल मुमकिन ही कहाँ।

आजाद तो हुए लेकिन आजाद नहीं।


आज हमारे भारत देश को आजाद हुए 70 साल हो चुके है। इन 70 सालों में इस देश ने बहूत कुछ देखा, कुछ अच्छी घटनाएं तो कुछ बुरी। 1947 से पहले हमारे देश में अंग्रेज़ो का राज था, लगभग 200 सालों तक अंग्रेजों की गुलामी से हमे हमारे वीर क्रांतिकारियों ने आजाद कराया। इन 70 सालों में हमारा देश बड़ी तेजी के साथ विकसित हुआ और आज भी हो रहा है, इन 70 सालों में हमारे देश की तस्वीर बदली और विश्व के सबसे विकासशील देशों में भारत का नाम पहुँचा, और हर छेत्र में हमारा तिरंगा लहराया।
          लेकिन क्या हम सच में आजाद है?क्या हमारे देश में रेह रहे करोड़ों लोगों की सोच आजाद हुयी है? तो इसका जवाब जवाब होगा नहीं। क्योंकि आज भी हमारे समाज में रेह रहे लोगों की सोच और सोचने की समता बहुत पीछे है।
भारत आगे तो लगातार बड़ रहा है मगर अंदर के हालात पहले जैसे ही है। आज भी हमारे देश के कई हिस्सों में लड़कियों को पढ़ाया नहीं जाता, देश में गरीबी, आरक्षण,ये सब हमारे देश की वो सचाई है जो न तब बदली थी ना आज बदली है। लेकिन हम आज़ाद है।
लड़कियो को सूरज ढलते ही घर प रहने के लिए बोला जाता है, उन्हें सामाज में अपने घरवालो और अपनी इज्जत देखनी पड़ती है चाहे इसके लिए उन्हें अपने सपने और अपनी इच्छाओं को ही क्यों ना मारना पड़े, मगर हम आजाद है।
यहाँ दिमाग से तेज होना इतना जरुरी नहीं जितना की किसी मंत्री या अधिकारी का रिश्तेदार कहलाना। यहाँ 90 प्रतिशत मायने नहीं रखते, जरूरी है तो बस आरक्षण। रोजाना हमारे देश में 20-25 बलात्कार और छेड़ छाड़ के मामले सामने आते है, हर साल कम से कम 5000 बलात्कार की घटनाएं हमारे देश में होती है। तो हम आजाद होते हुए भी क्यों आजाद नहीं है? हमारे देश को हजारों करोड़ों सैनिक सुरक्षा देते है, 15000 फ़ीट की ऊँचाई तक। लेकिन हमारे देश के अंदर ही करोड़ों आतंकवादी बेठे है जो हमारे देश को हमेसा शर्मिंदा करते है। अगर हर एक नागरिक ये सोच ले की वो कोई गलत काम नहीं करेंगे, समाज के बढ़ोत्तरी में हिस्सा लेंगे तो हमारा देश जिस गति से आगे बढेगा ये हम सोच भी नहीं सकते।
      आज आजादी के 70वें साल में चलो एक कसम लेते है कि अब से भारत की धरती पे कोई गलत काम नहीं होने देंगे। भुत बर्दाश कर लिया, बहुत सेह लिया अब ना गलत करेंगे न ही किसिको करने देंगे। ये देश हमारा घर है इसे सुंदर और साफ़ बनांए।

Saturday, 13 August 2016

वक़्त वक़्त की बात है...

कहते है वक़्त सबसे ज्यादा बलवान होता है,इसके आगे कुछ नहीं टिकता, जिसके साथ उसका वक़्त है वो भग्यशाली कहलाता है। किसी ने बिलकुल सही बात कही है कि वक़्त से दोस्ती कर लो क्योंकि दुश्मनी तो बहुत महंगी पड़ सकती है। और वो मुहावरा तो सबको याद ही होगा कि " काल करे सो आज कर आज करे सो अब" मतलब साफ़ है की हर काम को सही वक़्त पे करना चाहिए। किसी भी इंसान को आगे और पीछे करने में सबसे ज्यादा हाथ वक़्त का ही होता है। वक़्त सही हो तो इंसान दुनिया पे राज करता है और वक़्त खराब हो तो ऊँठ पे बेठे हुए इंसान को भी कुत्ता काट लेता है। 
      कहते है आने वाला वक़्त किसी ने भी नहीं देख रखा है, आज जो हमारे पास नहीं है वो शायद कल हमे मिल जाये और जो आज हमारे पास है वो शायद कल तक हमारा न रहे। हम सबको वक़्त की कीमत पता है शायद यही कारण है की हमे बचपन से ये बताया जाता है की वक़्त सबसे बलवान होता है हमे उसका सही उपयोग करना चाहिए।
        माना जाता है की वक़्त पर किसी का ज़ोर नहीं हॉट, ये लगातार चलता रहता है, ना किसी के लिए रुकता है न ही वापस आता है। ये तो सागर की लहरों की तरह है जो किसी का इन्तजार नहीं करता। वक़्त के साथ-साथ एक छोटा बच्चा बड़ा हो जाता है और फिर वक़्त के साथ-साथ इस दुनिया को छोड़ के चला जाता है। लेकिन वक़्त सबके लिए एक जैसा नहीं होता जो इसका साथ देता है बस वक़्त भी उसी का साथ देता है। रामायण काल में रावण को सबसे बुद्धिमान माना जाता था तब उसमे घमंड आ गया था की वो ही इस धरती पे सबसे ज्यादा शक्तिशाली और बुद्धिमान है। लेकिन वक़्त के साथ साथ उसका घमंड और साम्राज्य दोनों नष्ट हो गए। किसी इंसान का आज बहुत बुरा है लेकिन हो सकता है की आने वाला वक़्त उसके लिए ऐसा कल लेकर आये की उसकी सारी परेशानियाँ ठीक हो जाये।
      जब हमे चोट लगती है तो बहुत दर्द होता है लेकिन वक़्त के साथ साथ वो दर्द और घाव दोनों भर जाते है। जब हमारा कोई हमसे बहुत दूर चला जाता है तो दिन-रात हमे उसकी याद आती है, लेकिन वक़्त अपने साथ सब कुछ लेकर चला जाता है, वक़्त के साथ साथ हम भी उस परिस्थिति में ढल जाते है। यही तो असल ताक़त है वक़्त की , कि ये धीरे-धीरे सरे घाव, दर्द को भर देता है। इंसान को हमेसा वक़्त की कदर करनी चाहिए क्योंकि वक़्त का साथ होना बेहद जरुरी है। अगर हमारा वक़्त ही हमारे साथ नहीं है तो समज लीजिये की कुछ साथ नहीं है। 

Friday, 12 August 2016

अगर में प्रधानमंत्री होता..

किसी भी देश को चलाने के लिए वहाँ के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है। इनकी सूझ-भूज और निर्णय के कारण ही कोई देश आगे को अग्रसर होता है। देश का पहला चेहरा ही ये दोनों कहलाते है। देश का प्रधानमंत्री अपने देश के लिए बहुत सारे काम करते है, उनकी पूरी कोशिश रहती है है की विश्व के नक़्शे में उनका देश आगे रहे और हमेसा बढ़ते रहे। 
         बहुत बार में ये सोचता हूँ की अगर में प्रधानमंत्री होता ट सबसे पहले ये करता । बोलने में बेहद आसान लगता है लेकिन इसके लिए बहुत समय और संकल्प चाहिए। अक्सर में भी यही सोचता हु को अगर में प्रधानमंत्री होता तो सबसे पहले गरीबों और आम जनता के लिए काम करता, छोटी छोटी चीजों से शुरुवात करता। फिर धीरे धीरे उन्हें आगे लेकर चलता। मेरे हिसाब से एक प्रधानमंत्री को सबसे पहले देश की गरीबी, बेरोजगारी, और बिमारियों के लिए सोचना चाहिए।
  बुलेट ट्रेन, स्पेस राकेट और अंतर्राष्ट्रीय संबंध से आम नागरिक को क्या फायदा? जब तक अंदर की तस्वीर नहीं बदलेगी। पिछले 2-3 सालों से भारत में बुलेट ट्रेन लाने के लिए हजारों करोड़ों रुपए सरकार लगा चुकी है, इतने देशों के दौरे क्र चुकी है हमारी सरकार लेकिम क्या सच में उस बुलेट ट्रेन का फायदा होगा? फायदा तो छोड़ो अभी तो ये भी नहीं पता की वो यहाँ चल भी पायेगी या नहीं क्योंकि यहाँ तो ट्रैकों का ही बुरा हाल है। दूसरा ध्यान इस वक़्त सरकार का काला धन की तरफ है। देश का एक नागरिक भारत छोड़के विदेश में भाग गया उसे तो सरकार अभी तक वपुस लेकर नहीं आ सकी तो काला धन पे कितना समय लगेगा ये हर कोई सोच सकता है। ममेरे हिसाब से ये सब काम के लिए वक़्त है। अगर में प्रधान होता तो सबसे पहले भारत में हजारों स्कूल, हॉस्पिटल्स और NGOs खोलता। कोशिश करता की सबसे पहले एक शहर की रोड, बिजली पानी की समस्याओं को ठीक करूँ उसके बाद में विदेश यात्रा, या बुलेट ट्रेन के बारे में सोचता।
     लेकिन में किसिको उनके काम के लिए नहीं टोक रहा, इंसान जितना बड़ा होता है उनका ही उनके सर पे जिम्मेदारियां होती है। लेकिन मेरा तो साफ़ तौर पे ये मानना है की प्रधानमंत्री को सबसे पहले एक शहर से शुरुवात करनी चाहिए, क्योंकि शहर शहर जोड़कर एक राज्य बनता है पहर एक देश का निर्माण होता है। अगर में प्रधानमंत्री होता तो सबसे पहले इन्ही चीजों पे काम करता और कोशिश करता की मेरा काम हर एक व्यक्ति के लिए अच्छा हो।

Wednesday, 10 August 2016

मेहंगाई की मार, जनता बीमार


हमारे देश भारत में जितनी भाषाएँ है उससे ज्यादा यहाँ समस्याएं है। यहाँ करोड़ों की आबादी रहती है, जिसमे अमीर सामान्य और गरीब ये तीन तरह के लोग रहते है। पैसे वाले तो ख़ुशी ख़ुशी अपना जीवन व्यतीत करते है लेकिन सामान्य और गरीबी में जी रहे लोगों का जीवन बहुत संगर्ष भरा हो जाता है। आज की तारीख में आम जनता के लिए जो सबसे ज्यादा सरदर्द बना है वो है लगातार बढ़ती मेहंगाई । मेहंगाई तो मानो दिन दुगनी रात चौगुनी की गति से बड़ रही है और ये जनता भ्रस्ट सरकार से उम्मीद लगाई बेठी है की उनकी सरकार मेहंगाई कम करेगी। भारत में करोड़ों लोग इस मेहंगाई के कारण बेहद परेशान रहते है,इस मेहंगाई में 2 वक़्त की रोटी भी मानो चुनोती लगने लगी है। आज मेहंगाई आसमान छू रही है। रोटी, दाल, सब्जी,पेट्रोल, घर और यहाँ तक की पढ़ाई भी अब हर किसीके बसके बात नहीं रही। पिछले 10 सालों में दाल, सब्जी और तेल की कीमतों ने सबको रुलाया है और आज तक रुला रही है। हम सरकार बरोसे बेठे है और वो भगवान बरोसे। जब नयी सरकार आती है तो वादे तो ऐसे करती है की मानो मेहंगाई बस इनके आने से ही भाग जायेगी, लेकिन कुछ सालों में मेहंगाई भागे या ना भागे सरकार जरूर भाग जाती है। आज बढ़ती मेहंगाई से गरीब लोगों को खाना तक नसीब नहीं हो पता, शिक्षा को तो भूल ही जाओ तो बेहतर है। आज बाजार में एक रोटी की कीमत 8 रुपए हो गयी है, बच्चों को स्कूल कैसे भेजे वहां तो हर क्लास में हजारों रुपए लग जाते है। मेहंगाई की असल वजय है भ्रस्टाचार और हमारी सरकार। रोजाना टीवी और अख़बारों में हम देखते है की सरकारी गोदान में लाखों क्विंटल गेंहू, चीनी,प्याज,आलू रखे रखे ख़राब हो जाते है तो कभी बरसात या ठण्ड की वजय से सड़ जाते है। सरकार इन चेजों पे बिलकुल ध्यान नहीं देती वरना लाखों का अन्न यूं ही बर्बाद नहीं होता। ये तो रही सरकार की अनदेखी अब बात करे अगर कुछ अधिकारीयों की तो मेहंगाई को आसमान तक पहुचाने में इनका बेहद खास योगदान रहा है। अधिकारीयों की अनदेखी और सुस्ती की वजय से ही घोटाले होते रहे है जिनका असर आम लोगों पे पड़ता है। 
      आज मेहंगाई से सबसे ज्यादा प्रभावित निचले क्रम के लोग हो रहे है,क्योंकि अमीर और अमीर होता जा रहा है और गरीब ओर ज्यादा गरीब । इस बात का असर सरकार या ऊपर बेठे अधिकारीयों को बिलकुल नहीं होता क्योंकि उनकी जेबों में इतना ज्यादा पैसा होता है की मेहंगाई नाम की बीमारी उनके पास भी नी भटकती। सरकार का काम ही होता है जनता के लिए सोचना, उनकी तकलीफों को दूर करना। अरे!हम कौन सा सारी चीजों को जनता के लिए फ्री करने के लिए बोल रहे है, बस इतनी की आस है सरकार से की इस बढ़ती मेहंगाई को रोके क्योंकि जिस गति से मेहंगाई बड़ रही है उससे आने वाले सालों में आम जनता को दो वक़्त की रोटी के लिए भी बहुत मसक्कत करनी पड़ेगी।

Monday, 8 August 2016

सारा जमाना विज्ञापन का दीवाना...

आज का दौर विज्ञापन का दौर है। सुबह जब हमारी आँखें खुलती है तब से रात को सोने तक हमे अपने आस पास सबसे ज्यादा विज्ञापन ही दीखते है। विज्ञापन के बिना मानो आज के समय में कुछ भी संभव नहीं दिखता। एक जमाना था जब विज्ञापन बड़े बड़े लोगों या बड़े बड़े ब्रेण्ड द्वारा ही बनाये जाते थे, लेकिन आज हर छोटी बड़ी चीज में विज्ञापन बेहद ख़ास हो चुका है। विज्ञापन को अब सफलता की कुँजी कहना गलत नहीं होगा। 
          आज के इस भागदोड़ भरी जिंदगी में हर कोई पैसा, इज्जत और नाम के पीछे भाग रह है। अगर कोई कंपनी अपनी नई वास्तु लेकर आ रही है तो वो कंपनी उसके विज्ञापन के लिए अलग से लाखों-करोड़ों रुपए खर्च करने में संकोच नहीं करती क्योंकि उन्हें भी पता है की विज्ञापन आज के दौर में क्या भूमिका निभाता है और इससे उनके नए प्रोडक्ट या वास्तु को जान मिलती है। आज हम विज्ञापन को अपने हर तरफ देख सकते है। रोड के किनारे खड़े बिजली के पोल पे, या बड़ी बड़ी दीवारों में या गाड़ियों के पीछे। खासकर अख़बारों,रेडियो और टेलीविज़न में विज्ञापन का ही बोल बाला है। विज्ञापन के कारण ही आम लोग दिन दुनिया की चेजों को देख पाते है, विज्ञापन की वजय से ही हमे नए नए चीजों और सामानों का पता चल पता है। जब भी हम टेलीविज़न देखते है तो उसमे कार्यक्रम से ज्यादा हमे विज्ञापन देखने को मिलते है। हर 1 मिनट बाद कोई न कोई विज्ञापन हमसे रूबरू होता है।
              बदलते समय के साथ साथ विज्ञापन का स्वरुप भी बदला है। किसी ज़माने में विज्ञापन चुनिंदा जगहों पे ही देखे जाते थे, और तब इनके तरीके भी आज से बहुत अलग हुआ करते थे। विज्ञापन का महत्त्व काफी सालों पहले से चलता आ रहा है। बात करे महाभारत या रामायण काल की तो तब भी विज्ञापन चला करते थे। लेकिन उस ज़माने में न तो टीवी हुआ करते थे ना ही अखबार। अब विज्ञापन के लिए ढोल, पत्र का सहारा लिया जाता था। वो एक आसान माध्यम था अपनी बात को लोगों को बताने के लिए। आज आधुनिक उपकरण और बदलते दौर के साथ विज्ञापन का नज़रिया भी बदल चुका है। कोई राजनेता हो या कोई अभिनेता, कोई चाय की दूकान हो या बड़ी मोबाइल कंपनी हर किसीके लिए आज विज्ञापन बेहद जरुरी हो चुका है।
      लेकिन विज्ञापन सिर्फ निजी फायदे के लिए ही नहीं होते। अगर बात करे सरकारी विज्ञापनों की तो वो जनहित के लिए होते है,जैसे पल्स पोलियो.. दो बूंद जिंदगी की। लेकिन कुछ प्राइवेट विज्ञापन सिर्फ अपने काम के लिए होते है जैसे ब्यूटी क्रीम.. पाये गोरी त्वचा सिर्फ 2 हफ़्तों में। इस तरह के विज्ञापन में सच्चाई नहीं होती लेकिन हम फिर भी इसे खरीदते है क्योंकि इसका विज्ञापन हमारे आखों के सामने होता है। यही तो फायदा है विज्ञापन का कि ये किसी भी इंसान को मजबूर कर देती है दिखाई हुयी बात को मानने पर। हम आज टीवी पे हजारों विज्ञापन देखते है हमे अब इनकी आदत सी हो चुकी है । विज्ञापन का हमारे जीवन पे बहुत असर पड़ता है इसकी वजय से हम बहूत कुछ नया देखते है तो चीजों को अपनी जिंदगी में अपनाते भी है। आज का ये दौर बिना विज्ञापन के संभव नहीं है।

Sunday, 7 August 2016

डेंगू ले रहा जान पे जान

उत्तराखंड में परेशानियाँ रुकने का नाम ही नहीं ले रही है, पहले लगातार बारिश से बाढ़ और भूस्खलन की समस्या और अब डेंगू का बढ़ता प्रकोप। उत्तराखंड की ये तस्वीर हर साल देखने को मिलती है । हर साल बरसात में यहाँ क्या तांडव मचता है ये हम सब भली भांति जानते है,हर बार देखते है और बरसात के बाद शुरू हो जाता है डेंगू का जानलेवा कहर। 
            इस बार भी बरसात के साथ परेशानियाँ तो आई ही लेकिन अब प्रदेश के लोग डेंगू के प्रकोप से सहमे हुए है। अभी तक 300 मामले सामने सामने आ चुके है जिनमे से 8 मरीजों की डेंगू से मौत हो चुकी है। ये आंकड़ा लगातार बड़ रहा है खासकर राजधानी देहरादून में हालात बेहद खराब है। सिर्फ देहरादून में ही ढाई सौ से ज्यादा मामले सामने आये है, ऐसे में डेंगू किस तरह से पैर पसार रहा है ये प्रशाशन के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है।
    बरसात के समय में डेंगू का प्रकोप ज्यादा हो जाता है क्योंकि हर तरफ पानी इखट्टा हो जाता है। घर के सामने,इधर-उधर , नालियों में, पुराने बर्तनों में, नारियल के खोल में इन सब में पानी जमा हो जाता है फिर उसमे डेंगू के मच्छर पनपने लगते है, जो की लोगों के लिए काफी खतरनाक साबित हो जाते है।
   डेंगू की वजय से हर साल हजारों लोग अपनी जान खो देते है, लाखों लोग प्रभावित होते है ऐसे में सरकार भी इसमें काफी सतर्कता बरतती है। लेकिन सरकारी पोल तो तब खुलती है जब डेंगू का आंकड़ा आसमान छूने लगता है। सरकार अपनी तरफ से कोशिस तो करती है की लोगों को इसके प्रति जागरूक हो सके लेकिन फिर भी कहीं न कहीं गलतियां होती दिखती है। डेंगू आजकल बहुत तेज़ी से फ़ैल रहा है जिसके चलते लोगों में काफी डर भी देखा जा रहा है।
      डेंगू से बचने के लिए अपने आस पास के इलाके में साफ़ सफाई रखने की जरूरत होती है। कोशिश ये करनी चाहिए की किसी भी पुरानी चीज में पानी न जमा हो, क्योंकि उसी में डेंगू के मच्छर पनपते है। सरकार प्रचार प्रसार करके अपनी तरफ से जिम्मेदारी को पूरा बता देती है लेकिन असल जिम्मेदारी हमारी खुद की है, हमे ही अपने घर के आस पास साफ़ सफाई रखनी है,ताकि डेंगू को शुरू होने का भी मौका ना मिले।

Friday, 5 August 2016

वेलकम GST बिल..

आजकल एक नाम सबके कानों में सुनाई दे रहा है, GST बिल। क्या है ये GST बिल जिसके लिए राज्यसभा में इतना हंगामा हुआ, जिसका इन्तजार करोड़ो भारतीय कर रहे थे। GST मतलब गुड्स एंड सर्विस टैक्स। ये बेहद खास बिल माना जा रहा है जिसे अरुण जेटली जी ने भारी हंगामे के बीच राज्यसभा में प्रस्तुत किया । GST बिल अर्थव्यवस्था की दिशा में क्रन्तिकारी कदम है जिसका इन्तजार पिछले 17 सालों से हो रहा था लेकिन अब ये बिल पास हो चुका है।
        अभी तक राज्यों में अलग-अलग स्थानीय टैक्स लगाया जाता है, जिससे कार अौर पेट्रोल का मूल्य हर राज्य में
अलग-अलग होता है,कई सामानों की कीमत विभिन्न राज्यों में अलग अलग होती है। परंतु जीएसटी बिल लागू होने के बाद ऐसा नहीं होगा। प्रत्येक उत्पाद या वस्तुओं पर लगने वाले टैक्स में केंद्र और राज्यों को बराबर भाग मिलेगा। इससे पूरे देश में एक प्रोडक्ट लगभग एक जैसी ही कीमत पर मिलेगा और पहले से सस्ता मिलेगा। व्यापारियों को अब अपना सामान एक जगह से दूसरी जगह लेकर जाने में कोई परेशानी नहीं करनी पड़ेगी क्योंकि अब एक ही तरह का टैक्स पड़ेगा। अभी तक भारत में सेंट्रल सेल्स टैक्स, वैट, मनोरंजन, एक्साइज़ और लग्जरी जैसे 20 टैक्स लगा करते थे लेकिन अब सर्फ एक ही टैक्स लगेगा जो कि 18% होगा और इसका नाम है GST।
        अभी तक 165 देशों में GST लागू है, अब भारत में GST लागू हो चूका है और भारत 166वा देश बन चुका है जो GST के अंतर्गत आता है। अमेरिका में 14%GST लगता है तो वहीँ पाकिस्तान में भी 18 % का GST लागु है। GST बिल लागू होने के बाद अब हाउस और कार जैसी चीजों में राहत मिल सकती है। क्योंकि अभी तक अनेक तरह के टैक्स लगते थे लेकिन अब सिर्फ GST लगेगा जिसका मतलब इन चीजों में 45 हजार रुपए तक छूट मिल सकती है। कुल मिलके बात ये है की GST बिल से महंगाई से कुछ हद तक तो राहत मिल सकती है, भले ही आम जनता को बिल लागू होने के कुछ समय तक महंगाई से सामना करना पड़े लेकिन ये बिल बहुत सी चेजों में राहत दे सकता है।

Wednesday, 3 August 2016

फिर शर्मसार हुआ हिंदुस्तान


1947 में जब भारत आजाद हुआ था तब किसि को ये मालूम नहीं था की जिस हिंदुस्तान के लिए हमारे वीर क्रान्तिकारी अपनी जान की बाज़ी लगा रहे है, उस हिंदुस्तान में कुछ दरिंदे देश की इज्जत को हमेशा ताड़ ताड़ करने की कोशिश करेंगे। बड़े शर्म की बात है की जिस देश में लड़कियों को भगवान का रूप माना जाता है उसी देश के अंदर रोजाना 15-20 बलात्कार या छेड़ छाड़ की घटनाएं होती है, यानी हर साल हमारे देश से लगभग 4000 ऐसी घटनाएं सामने आती है।
              हमारे देश का कानून या प्रशाशन दोनों ही इन मामलों में कहीं न कहीं सुस्त सी दिखती है। ताज़ा मामला यूपी के बुलंदशहर का है जहाँ आधी रात को मैन हाईवे पर एक माँ और उसकी 14 साल की बेटी से सामूहिक दुष्कम हुआ। सामने से पुलिस की गाड़ी गुजरी लेकिन किसी का भी ध्यान हाईवे से मात्र 40मीटर दूर उस वारदात की तरफ नहीं गया। रात भर पीड़ित 100 नंबर पे कॉल करते रहे , चीखते रहे, रोते रहे लेकिन कोई मदद के लिए नहीं आया। उस वक़्त उनके दिल में क्या गुजर रही होगी ये सिर्फ वो ही जानते होंगे लेकन इसे महसूस तो पूरा हिंदुस्तान कर सकता है। आपको जानकर हैरानी होगी की देश की सबसे बड़ी पुलिस फ़ोर्स उत्तर प्रदेश के पास है, सबसे ज्यादा आईपीएस अफसर यहीं है,लेकिन सबसे ज्यादा घिनोने काम भी यूपी में ही देखने को मिलते है । हालात बेहद ख़राब हो चुके है,इन सब घटनाओं में न पुलिस सख़्ती दिखती है न ही हमारी सरकार।आज पूरा हिंदुस्तान उन माँ बेटी के साथ खड़े होने की बात कर रहा है लेकिन काश उस रात सिर्फ 1 पुलिस कर्मी उनके साथ खड़ा होता तो वो घिनोनी रात उनकी जिंदगी में कभी नहीं आती। हमेसा की तरह सरकार वारदात के बाद ही जागी और आरोपियों को सख्त से सख्त सजा देने की बात कही। ये पहली बार नहीं है की हमारे देश में इस तरह की घटनाएं सामने आई हो। हर साल हजारों ऐसी ही घटनाएं होती है, हर साल कोई नया दरिंदा वारदात को अंजाम देता है,हर साल देश ऐसे ही रोता है लेकिन तस्वीर घूम के वहीँ आ जाती है।
                  आखिर क्यों हमारे देश में लड़कियां सुरक्षित नहीं है? सरकार वादे तो तमाम करती है की महिलाओं की सुरक्षा के लिए ये काम किया-वो काम किया, लेकिन हक़ीक़त क्या है आज एक बार फिर हिंदुस्तान ने अपनी आखों से देख लिया। जब जरूरत पड़ी न 100 नंबर काम आया न ही मित्र कहलाने वाली पुलिस।

Monday, 1 August 2016

सेल्फी का क्रेज़ ...पागलपन या बेहक़ूफी



बड़े ताज्जुब की बात है, एक जमाना था जब इंसान डेंगू,कैंसर जैसी बिमारियों से हारकर अपनी जिन्दगी खोया करते थे, लेकिन आज लोग सेल्फ़ी के चक्कर में अपनी जान खो रहे है। सेल्फ़ी लेने के लिए लोग सावधानियों को अनदेखा करते है और नतीजा उन्हें मौत से चुकाना पड़ता है। इसे सेल्फ़ी के लिए पागलपन कहे या अपनी बेहक़ूफ़ि क्योंकि आजकल बच्चे,बड़े सब सेल्फ़ी लेने के चक्कर में गलती कर बैठते है और अपनी जिंदगी को खतरे में डाल देते है।
           आज से 10 साल पहले तक सेल्फ़ी शब्द इतना प्रचलन में नहीं था लेकिन बीते 3-4 सालों में सेल्फ़ी का क्रेज़ युवाओं के सर चड़कर बोलने लगा है। सबसे पहले ये सेल्फ़ी होती क्या है? सेल्फ़ी मतलब खुद की फ़ोटो खीचना,चाहे मुँह तेडा-मेड़ा करके या बतख जैसा बनाके। सेल्फ़ी लेने के लिए लोग ना जाने क्या क्या बेहक़ूफी करते है। इस तरह के लोगों में कुछ अलग करने की बूख रहती है इसलिए ये सेल्फी अलग अलग तरह से लेते है। कभी बीच रोड में बैठ कर, कभी नदी के किनारे में, कभी झरने के सामने तो कभी ऊँची पहाड़ियों पर। ऐसे खतरे भरे जगहों पर सेल्फ़ी लेना बेहद झोखिम वाला काम है। सेल्फी लेते वक़्त हमारा पूरा ध्यान अपनी फ़ोटो पे होता है, मन में यही चलता है की बस सेल्फ़ी खूबसूरत आये जिसके चलते बहुत बार देखा जाता है की पैर फिसलने से लोगों की जान पे बन आती है। रोजाना सेल्फ़ी के वक़्त हादसों की खबरें आती है लेकिन लोग इसे अनदेखा कर देते है। ताज़ा मामला उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली 20 वर्षीय पूजा का है को भोपाल के स्पोर्ट्स कॉलज में पड़ती थी, सेल्फ़ी लेते वक़्त वो कॉलज के अंदर बने झील में डूब गयी। ये पहला मामला नहीं है की सेल्फी के वक़्त हादसा हुआ हो इससे पहले भी बहुत से केस ऐसे आ चुके है।जानकार हैरानी जरूर होगी कि पिछले 5 सालों में सिर्फ भारत में ही सेल्फ़ी के चक्कर में लगभग 200-300 लोगों की जान गयी है, जिसमे से 90 प्रतिशत केस में मौत सेल्फी लेते हुए पैर फिसलने से हुयी है। आजकल सेल्फ़ी का क्रेज़ बेहद बड़ चुका है खासकर युवाओं में। नई नई जगहों पर सेल्फ़ी लेना किसे पसंद नहीं है लेकिन इसके साथ साथ हमे अपनी सुरक्षा भी देखने की जरूरत है।
            सेल्फ़ी और लड़कियों का तो बेहद गेहरा रिश्ता है। सेल्फ़ी लेकर फेसबुक पर शेयर करना और उसपे पाउट का तड़का भले ही हर लड़के को भाता हो, लेकिन सभी को इस बात पे भी गौर करने की जरूरत है कि सेल्फ़ी के लिए जिंदगी को दाव पे ना लगाये, अपनी सुरक्षा और सावधानियों को पहले अपनाये।

पहाड़ों पर जिंदगी

आजकल हर कोई शहरों की तरफ आने को बेताब है, यहाँ की रौनक और सुविधाएं देखकर लोग पहाड़ों को छोड़कर शहरों की तरफ आर्कषित हो रहे है। शहरों की जिंदगी पहाड़ों की जिंदगी से पूरी तरह अलग है। शहरों पर सुबह लोग आराम से उठते है, चाय से सुबह की शुरुवात करके फिर अपने अपने काम पर चले जाते है। बहुत सी आधुनिक चीजों के साथ से  शहरों पर रेह रहे लोगों की जिंदगी बेहद आसान और आधुनिक हो चुकी है।
              मगर पहाड़ों पर जिंदगी इससे बिलकुल अलग है, वहाँ ना ही अभी तक आधुनिक सुविधाएं पहुची है ओर ना ही मूल भूत सुविधाएं। जिसके चलते अब पहाड़ों को पलयन जैसी समस्याओं से गुजरना पड़ रहा है।शहरों के मुकाबले पहाड़ों पर जिंदगी बहुत दुर्लभ और मुश्किल भरी है, यहाँ लोगों को पानी के लिए मीलों तक पैदल जाना पड़ता है, पढ़ाई के लिए स्कूल नहीं होते और बिजली, सड़क जैसी सुविधाएं न होने के कारण लोग पलायन को मजबूर है। हर परिवार को एक अच्छी जिंदगी बिताने के लिए शिक्षा,पानी,बिजली,सड़क और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएँ चाहिए, इन पाँच रत्नों के बिना जिंदगी हमेसा संगर्ष करती दिखती है। हमारी सरकार हजारों दावे करती है, गाऊं की तस्वीर बदलने की बात कहती है लेकिन हालात पहले जैसे ही है, सरकार के अलावा कुछ नहीं बदला। अभी भी हजारों गाऊं ऐसे है जहाँ पीने का पानी तक नहीं मिल पता, तो शिक्षा-बिजली तो कोसो दूर की बात है। इन सब बातों से साफ़ पता चलता है की पहाड़ों पर जिंदगी जीना किसी चुनोती से कम नहीं है। यहाँ के लोगों के जहन में सिर्फ एक ही सवाल हमेसा से रहता आया है कि क्या कभी हमारे पहाड़ों पर कोई सुविधाएं पहुँच पाएगी या नहीं?